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क्रांतिज्योति सावित्रीबाई फुले: शिक्षा, समानता और सामाजिक क्रांति की अमर ज्योति

संवाद सूत्र रांची, झारखंड। 9304830027

भारतीय समाज के इतिहास में कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं, जिनका जीवन केवल एक कालखंड तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वे विचार, संघर्ष और प्रेरणा के रूप में युगों तक मार्गदर्शन करते हैं। ऐसी ही एक महान विभूति थीं क्रांतिज्योति सावित्रीबाई फुले, जिन्हें भारत की प्रथम महिला शिक्षिका होने का गौरव प्राप्त है। उन्होंने शिक्षा और समानता की मशाल जलाकर सामाजिक परिवर्तन की वह नींव रखी, जिस पर आधुनिक और प्रगतिशील भारत का निर्माण संभव हुआ।

प्रारंभिक जीवन और शिक्षा

सावित्रीबाई फुले का जन्म 3 जनवरी 1831 को महाराष्ट्र में हुआ। उनके पिता का नाम खंडोजी नेवसे और माता का नाम लक्ष्मीबाई था। उस समय समाज में स्त्री शिक्षा को न केवल अनावश्यक बल्कि अनुचित भी माना जाता था। बाल्यावस्था में ही उनका विवाह 1841 में महात्मा ज्योतिराव फुले से हुआ। ज्योतिराव फुले ने सावित्रीबाई के भीतर छिपी प्रतिभा को पहचाना और स्वयं उन्हें पढ़ना-लिखना सिखाया। यही शिक्षा आगे चलकर सामाजिक क्रांति का आधार बनी।

भारत की प्रथम महिला शिक्षिका

सावित्रीबाई फुले को भारत की प्रथम महिला शिक्षिका होने का गौरव प्राप्त है। उन्होंने न केवल स्वयं शिक्षा प्राप्त की, बल्कि महिलाओं और दलितों के लिए शिक्षा के द्वार खोले। 1848 में पुणे में पहले बालिका विद्यालय की स्थापना कर वे उसकी पहली प्रधानाचार्या बनीं। उस दौर में जब लड़कियों का स्कूल जाना सामाजिक अपराध माना जाता था, सावित्रीबाई प्रतिदिन अपमान, तिरस्कार और विरोध सहते हुए विद्यालय जाती थीं। समाज की कटु टिप्पणियाँ और पत्थर भी उनके संकल्प को डिगा नहीं सके।

सामाजिक सुधार की अग्रदूत

सावित्रीबाई फुले केवल शिक्षिका ही नहीं, बल्कि एक निर्भीक सामाजिक सुधारक भी थीं। उन्होंने

विधवा विवाह को प्रोत्साहन दिया,

छुआछूत और जातिगत भेदभाव के खिलाफ आवाज उठाई,

महिलाओं की शिक्षा, सम्मान और अधिकारों के लिए संघर्ष किया।

उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि शिक्षा ही वह शक्ति है, जो समाज की जड़ों में जमी कुरीतियों को उखाड़ सकती है।

कवयित्री और विचारक

सावित्रीबाई फुले मराठी साहित्य की आदिकवियत्री भी मानी जाती हैं। उनकी कविताओं में शिक्षा, आत्मसम्मान, समानता और सामाजिक न्याय का संदेश स्पष्ट रूप से झलकता है। उनकी रचनाएँ आज भी समाज को सोचने और बदलने के लिए प्रेरित करती हैं।

सत्यशोधक समाज और सेवा भावना

महात्मा ज्योतिराव फुले के साथ मिलकर उन्होंने सत्यशोधक समाज के माध्यम से सामाजिक सुधार आंदोलन को नई दिशा दी। उनका जीवन सेवा और करुणा का प्रतीक था। 1897 में प्लेग महामारी के दौरान वे पीड़ितों की निस्वार्थ सेवा में जुटीं रहीं और इसी सेवा कार्य के दौरान 10 मार्च 1897 को उनका निधन हो गया।

विरासत और प्रेरणा

क्रांतिज्योति सावित्रीबाई फुले आज भी शिक्षा, समानता और महिला सशक्तिकरण की जीवंत प्रतीक हैं। उनका जीवन यह संदेश देता है कि संघर्ष चाहे कितना ही कठिन क्यों न हो, यदि उद्देश्य मानवता और न्याय का हो तो परिवर्तन अवश्य संभव है।

संदेश

सावित्रीबाई फुले का जीवन हमें सिखाता है कि ज्ञान ही सबसे बड़ा हथियार है। उनकी जयंती पर यह हमारा दायित्व है कि हम शिक्षा, समानता और सामाजिक न्याय की ज्योत को और प्रज्वलित करें। यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

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