
जाट समाज ने सौंपा ज्ञापन ओबीसी आरक्षण 52%करने आँतरिक न करने की मांग
जाट समाज संस्थान ने सौंपा ज्ञापन: ओबीसी आरक्षण कोऐ 52% करने और आंतरिक वर्गीकरण न करने की मांग
भादरा विनोद खन्ना बुधवार को जाट समाज संस्थान भादरा ने एडवोकेट रविन्द्र मोठसरा के नेतृत्व में स्थानीय उपखण्ड अधिकारी को अन्य पिछड़ा वर्ग आयोग (राजनैतिक वर्गीकरण) के नाम ज्ञापन सौंप पंचायती राज संस्थाओं एवं नगरीय निकायों के निर्वाचनों में अन्य पिछडा वर्ग के अन्दर आन्तरिक वर्गीकरण न किये जाने व OBC आरक्षण 52 % किये जाने की मांग की । ज्ञापन में कहा गया कि राज्य में अन्य पिछडा वर्ग आयोग के माननीय सदस्यों की हनुमानगढ जिले में जन सुनवाई में पंचायती राज संस्थाओं एवं नगरीय निकायों के निर्वाचनों में अन्य पिछडा वर्ग के आरक्षण के संबंध में हमारा अभ्यावेदन नियमानुसार प्रस्तुत है:
देश में आज़ादी के बाद अभी तक जातिगत जनगणना नहीं होने के कारण राजस्थान में OBC वर्ग में शामिल 95 जातियों ( MBC सहित ) के जातिवार पृथक आँकड़े उपलब्ध नहीं है परंतु ओबीसी वर्ग को नौकरियों व शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश के लिए आरक्षण प्रदान करने के लिए गठित मंडल कमीशन ने अपनी रिपोर्ट में देश की कुल जनसंख्या में ओबीसी की संख्या 52% बताई थी।
उल्लेखनीय तथ्य यह है कि राजस्थान में ओबीसी वर्ग को 21% आरक्षण वर्ष 1993 में मिला था । उसके बाद राजस्थान में जाट, बिश्नोई, कायमखानी, मेव, कळबी, पटेल आदि जातियों को ओबीसी वर्ग में शामिल किया गया जिनकी जनसंख्या राज्य की कुल आबादी में 30 % से ज़्यादा है । इस तरह से ओबीसी वर्ग की आबादी राज्य की कुल जनसंख्या में 50% से अधिक होती है जबकि पंचायत राज संस्थाओं व नगरीय निकायों में ओबीसी वर्ग का आरक्षण मात्र 21% ही मिला हुआ है जो कि वर्तमान में किसी भी दृष्टि से न्यायसंगत नहीं है। अतः हमारी मांग है कि राज्य की पंचायती राज संस्थाओं एवं नगरीय निकायों के निर्वाचनों में ओबीसी की जनसंख्या को ध्यान में रखते हुए ओबीसी वर्ग के आरक्षण प्रतिशत में बढ़ोतरी की जाए।
माननीय सुप्रीम कोर्ट द्वारा लागू की गई आरक्षण की 50 प्रतिशत सीमा को पंचायतराज व स्थानीय स्वशासन की संस्थाओं के चुनावों में निम्न कारणों से लागू नहीं किया जा सकता है :-
पहला- दरअसल नौकरियों में 50 प्रतिशत आरक्षण की अधिकतम सीमा के पीछे माननीय सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय का मूल आधार यह था कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15(4) 16(4) के तहत तथा अनुच्छेद 335 व 340 की व्यवस्था के तहत समाज के पिछड़े वर्गों को नौकरियों में आरक्षण दिया गया है। माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा नौकरियों में आरक्षण की अधिकतम सीमा 50% तक ही सीमित रखने का निर्णय किया जिससे कि प्रशासनिक कार्य कुशलता प्रभावित नहीं हो। उल्लेखनीय है कि उक्त सिद्धांत स्थानीय स्वशासन की संस्थाओं के मामले में लागू नहीं किया जा सकता है, क्योंकि इन संस्थाओं में प्रतिनिधियों को मतदाताओं द्वारा निर्वाचित किया जाता है न कि किसी अन्य प्रतियोगी परीक्षा व प्रक्रिया से चयनित किया जाता है ।
दूसरा- भारतीय संविधान में 103वें संविधान संशोधन (2019 ) के द्वारा संविधान के अनुच्छेद 15(6) और 16(6) में संशोधन द्वारा ईडब्ल्यूएस (आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग) को 10% आरक्षण जनवरी 2019 में लागू किया गया। EWS को दिया गया आरक्षण केवल नौकरियों व शैक्षणिक संस्थाओं में प्रवेश पर ही लागू होता है, निर्वाचन पर नहीं। अर्थात नौकरियों के लिए प्रदान किए गए आरक्षण के प्रतिबंधात्मक प्रावधानों को हुबहू निर्वाचित संस्थाओं के लिए लागू नहीं किया जा सकता है ।
इसके अलावा तर्क के आधार पर यह भी कहा जा सकता है कि EWS आरक्षण लागू होने के बाद आरक्षण पर लागू की गई 50% की सीमा ख़त्म हो गई है। अतः राजस्थान में पंचायत राज व नगरीय निकायों में ओबीसी वर्ग को राज्य में उनकी जनसंख्या को ध्यान में रखते हुए ओबीसी के आरक्षण कोटे में बढ़ोतरी करते हुए ओबीसी वर्ग को कम से कम 52% आरक्षण प्रदान किया जावे।
इस तथ्य को स्पष्ट रूप से समझा जाना चाहिए कि सरकारी नौकरियों में 50% आरक्षण की सीमा का आधार प्रशासनिक दक्षता और मेरिट से जुड़ा हुआ है, जबकि पंचायत राज और स्थानीय निकाय लोकतांत्रिक संस्थाएँ हैं, जहाँ प्रतिनिधि प्रतियोगी परीक्षा से नहीं बल्कि मतदाताओं द्वारा चुने जाते हैं। इस कारण नौकरियों से संबंधित आरक्षण के प्रतिबंधात्मक सिद्धांतों को निर्वाचित संस्थाओं पर यांत्रिक रूप से लागू करना संवैधानिक भावना के अनुरूप सही नहीं माना जा सकता।
इसके अतिरिक्त, यह तथ्य भी विचारणीय है कि पंचायत राज संस्थाएँ सामाजिक न्याय को जमीनी स्तर तक पहुँचाने का माध्यम हैं। यदि इन संस्थाओं में ओबीसी की कुल आबादी के अनुपात में आरक्षण के माध्यम से ओबीसी को प्रतिनिधित्व नहीं मिलेगा, तो आरक्षण का मूल उद्देश्य—सशक्तिकरण और सहभागिता—अधूरा रह जाएगा।
. राज्य में अभी तक ओबीसी वर्ग में शामिल 95 जातियों ( MBC सहित) की जातिवार जनगणना नहीं की गई है। अतः जातिवार जनगणना किए बिना पंचायत राज व नगरीय निकायों में ओबीसी वर्ग के आरक्षण का वर्गीकरण या बाईफरकेशन किया जाना किसी भी आधार पर न तो विधिसम्मत है और न ही न्यायसंगत। ऐसे किसी भी प्रयास या कदम का जाट समाज पुरजोर विरोध करता है। ओबीसी आरक्षण में किसी तरह के वर्गीकरण या बाईफरकेशन समाज को स्वीकार्य नहीं होगा।
ओबीसी में शामिल जातियों के बिना जातिगत आँकड़ों के ओबीसी वर्ग को आंतरिक रूप से विभाजित करने की मांग न केवल तर्कहीन है, बल्कि सामाजिक समरसता के लिए भी प्रतिकूल है। आँकड़ों के अभाव में ओबीसी का कोई भी वर्गीकरण कानूनी कसौटी पर टिक पाना संभव नहीं होगा। अतः जाट समाज द्वारा प्रस्तुत अभ्यावेदन में दिए गए उक्त सुझावों एवं तत्संबंधी मांग पर सकारात्मक निर्णय लेने की अनुकम्पा करें।
ज्ञापन सौंपते समय श्री प्रताप बेनीवाल, श्री धर्मपाल गोदारा, विरेन्द्र बेनीवाल, डॉ आनन्द मोठसरा, एडवोकेट विजेन्द्र बेनीवाल, एडवोकेट प्रभुराम गोदारा, सुनील बेनीवाल निनाण, सुभाष थोरी, अजीत सुरतपुरा आदि उपस्थित रहे ।