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बांग्लादेश में हिंदुओं पर अत्याचार पर भारत सरकार की चुप्पी अपराध के समान

बांग्लादेश में हिंदुओं पर अत्याचार पर भारत सरकार की चुप्पी अपराध के समान
बांग्लादेश में हिंदू समाज पर हो रहे अमानवीय और सुनियोजित अत्याचारों के बावजूद भारत सरकार की भूमिका केवल औपचारिक बयानबाजी और दिखावटी चिंता तक सीमित रह गई है। ज़मीनी स्तर पर कोई ठोस, प्रभावी और निर्णायक कार्रवाई न होना सरकार की गंभीर विफलता को उजागर करता है। मंदिरों पर हमले, हिंदू बस्तियों को निशाना बनाना, महिलाओं पर अत्याचार और धार्मिक उत्पीड़न आज बांग्लादेश की भयावह सच्चाई बन चुके हैं।
इस भयावह स्थिति के बावजूद भारत सरकार का मौन केवल दुर्भाग्यपूर्ण नहीं बल्कि शर्मनाक है। बांग्लादेश में हिंदुओं की संख्या लगातार घट रही है, जो किसी आँकड़े का खेल नहीं बल्कि एक पूरे समुदाय के अस्तित्व को समाप्त करने की साजिश का संकेत है। यदि आज बांग्लादेश को कड़ा और स्पष्ट संदेश नहीं दिया गया, तो आने वाले समय में इसके गंभीर परिणाम भारत को भी भुगतने पड़ सकते हैं।
करोड़ों की आबादी वाला बांग्लादेश आज भारत के लिए केवल एक पड़ोसी देश नहीं, बल्कि एक गंभीर मानवाधिकार और राष्ट्रीय सुरक्षा संकट बन चुका है। इसके बावजूद न तो सरकार के पास कोई ठोस नीति दिखाई देती है और न ही मजबूत नेतृत्व। यह ढीलापन अत्याचार करने वाले तत्वों को खुली छूट देने जैसा है।
यह मुद्दा किसी राजनीतिक दल को घेरने का साधन नहीं, बल्कि हिंदू समाज के अस्तित्व, मानव गरिमा और भारत की नैतिक जिम्मेदारी से जुड़ा प्रश्न है। अब केवल भाषण, ट्वीट और काग़ज़ी संवेदनाएँ पर्याप्त नहीं हैं। यदि भारत सरकार अब भी निर्णायक कदम उठाने में विफल रहती है, तो इतिहास इस चुप्पी को कायरता नहीं बल्कि अपराध में सहभागिता के रूप में दर्ज करेगा।
यह अब चेतावनी नहीं, सीधा आरोप है।

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