
*राष्ट्रीय प्राकृत भाषा अध्ययन कार्यशाला का भव्य एवं प्रेरणादायी उद्घाटन*
*राष्ट्रीय प्राकृत भाषा अध्ययन कार्यशाला का भव्य एवं प्रेरणादायी उद्घाटन*
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*नैनागिरि* ।। केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली (शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार) तथा प्राकृत भाषा विकास फाउण्डेशन के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित *21 दिवसीय राष्ट्रीय प्राकृत भाषा अध्ययन कार्यशाला* का *उद्घाटन सत्र 25 दिसम्बर 2025* को अत्यन्त भव्य, गरिमामय एवं प्रेरणादायी वातावरण में सम्पन्न हुआ। यह सत्र केवल एक औपचारिक उद्घाटन नहीं, बल्कि प्राकृत भाषा के पुनर्जागरण का सशक्त उद्घोष सिद्ध हुआ। प्रातः 10 बजे प्रारम्भ हुए इस कार्यक्रम में देश के विभिन्न प्रान्तों से आए विद्वान, शोधार्थी, शिक्षक एवं प्रतिभागी उपस्थित रहे। उद्घाटन की मंगलवेला में *आचार्यश्री वसुनंदीजी महाराज* द्वारा विरचित प्राकृत स्तुति के सामूहिक उच्चारण से सम्पूर्ण सभागार आध्यात्मिक ऊर्जा से भर उठा। इसके पश्चात् राष्ट्रगीत एवं केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलगीत के गायन ने राष्ट्रीय चेतना और अकादमिक एकात्मता का भाव जाग्रत किया। अतिथियों द्वारा चित्रानावरण एवं दीप प्रज्वलन कर ज्ञान–दीप प्रज्वलित किया गया, जो प्राकृत भाषा के अध्ययन–प्रसार का प्रतीक बना।
*उद्घाटन सत्र के मुख्य अतिथि प्रो. यशवंतसिंह ठाकुर* ने अपने ओजस्वी एवं विचारोत्तेजक उद्बोधन में कहा कि प्राकृत भाषा भारतीय ज्ञान परम्परा की मूल धारा है, जिसके बिना दर्शन, साहित्य और संस्कृति की सम्यक् समझ अधूरी है। उन्होंने कहा कि ऐसी कार्यशालाएँ नई पीढ़ी को अपनी भाषायी जड़ों से जोड़ने का प्रभावी माध्यम हैं। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए *प्रो. ऋषभचन्द जैन फौजदार* ने प्राकृत भाषा को लोक और शास्त्र के सेतु के रूप में निरूपित करते हुए कहा कि *21 दिवसीय यह कार्यशाला* अध्ययन, चिन्तन और शोध की दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण सिद्ध होगी। मुख्य वक्तव्य में *डी. ब्र. राकेश जैन ने* प्राकृत भाषा के व्याकरणिक, दार्शनिक एवं साहित्यिक पक्षों की वैज्ञानिकता को उदाहरणों सहित स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि प्राकृत केवल अतीत की भाषा नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य की शोध–भाषा भी है। उद्घाटन सत्र में अतिथियों एवं प्रशिक्षकों का स्वागत–सम्मान तीर्थक्षेत्र कमेटी एवं *प्राकृत भाषा विकास फाउण्डेशन* द्वारा परम्परागत विधि से किया गया। स्वागत भाषण में *डॉ. कैलाशचन्द सैनी* ने कार्यशाला के उद्देश्यों, संरचना और अपेक्षित उपलब्धियों को रेखांकित किया, जबकि नैनागिरि तीर्थक्षेत्र प्रतिनिधि श्री देवेन्द्र जैन लुहारी ने तीर्थक्षेत्र की ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक गरिमा पर प्रकाश डाला।
प्राकृत भाषा विकास फाउण्डेशन का परिचय देते हुए *डॉ. आशीष जैन ने फाउण्डेशन द्वारा प्राकृत भाषा के* संरक्षण, प्रशिक्षण और शोध हेतु किए जा रहे सतत् प्रयासों की विस्तार से जानकारी दी। कार्यशाला की विस्तृत रूपरेखा एवं अध्यापकों का परिचय *डॉ. धर्मेन्द्र जैन* ने प्रस्तुत किया तथा *डॉ. सतेन्द्र जैन ने* कार्यशाला के शैक्षिक, अकादमिक एवं व्यावहारिक महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि यह आयोजन प्रतिभागियों के लिए वैचारिक समृद्धि का अवसर बनेगा। *कुलगुरु अभिभाषण में प्रो. यशवंतसिंह ठाकुर* ने प्राकृत अध्ययन को वैश्विक परिप्रेक्ष्य में प्रासंगिक बताया, वहीं अध्यक्षीय भाषण में *प्रो. ऋषभचन्द जैन फौजदार* ने इसे भारतीय भाषायी चेतना के पुनर्संस्कार का सशक्त प्रयास बताया। परम पूज्य *मुनिश्री शाश्वतसागरजी* महाराज ने अपने आशीष वचनों में कहा – प्राकृत भाषा भारतीय संस्कृति की प्राण है। इस पुनर्जीवित करने के लिए यह सर्वश्रेष्ठ माध्यम है।
सम्पूर्ण कार्यक्रम का अनुशासित, सुस्पष्ट एवं प्रभावी संचालन *डॉ. आशीष जैन आचार्य* द्वारा किया गया। उद्घाटन सत्र का समापन राष्ट्रगान के साथ हुआ तथा *श्री राजेश जैन रागी बक्स्वाहा एवं डॉ. प्रभातकुमार दास* द्वारा प्रस्तुत भावपूर्ण धन्यवाद ज्ञापन करते हुए *प्राकृताचार्यश्री सुनीलसागरजी* महाराज द्वारा विरचित प्राकृत स्तुति पूर्वक कार्यक्रम को सार्थक पूर्णता प्रदान की। उद्घाटन सत्र ने यह स्पष्ट कर दिया कि *21 दिवसीय राष्ट्रीय प्राकृत भाषा अध्ययन कार्यशाला* भारतीय ज्ञान परम्परा के संरक्षण एवं संवर्धन की दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर सिद्ध होगी। यह जानकारी प्राकृत भाषा फाउंडेशन के मीडिया प्रभारी प.लोकेश जैन शास्त्री गनोड़ा के द्वारा दी गई।