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महामना मालवीय : शिक्षा, संस्कृति और राष्ट्रचेतना के अमर दीप (जयंती पर विशेष समाचार )

✍️ हरिदयाल तिवारी
आज देशभर में पंडित मदन मोहन मालवीय की जयंती श्रद्धा, सम्मान और प्रेरणा के साथ मनाई जा रही है। 25 दिसंबर 1861 को प्रयागराज (तत्कालीन इलाहाबाद) में जन्मे महामना मालवीय भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के अग्रणी नेता, महान शिक्षाविद्, समाजसुधारक और राष्ट्रनिर्माता थे। उनका पूरा जीवन शिक्षा, संस्कृति और राष्ट्रीय चेतना के लिए समर्पित रहा।
पंडित मदन मोहन मालवीय को “महामना” की उपाधि उनके उदार, करुणामय और राष्ट्रहित में समर्पित व्यक्तित्व के कारण मिली। वे मानते थे कि स्वतंत्र भारत की नींव मजबूत शिक्षा व्यवस्था और नैतिक मूल्यों पर ही रखी जा सकती है। इसी सोच का प्रतिफल 1916 में काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) की स्थापना के रूप में सामने आया, जो आज एशिया के प्रमुख शिक्षण संस्थानों में गिना जाता है। बीएचयू केवल एक विश्वविद्यालय नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान-परंपरा, विज्ञान और आधुनिक शिक्षा का समन्वय है।
मालवीय जी का मानना था कि शिक्षा केवल रोज़गार पाने का साधन नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण और राष्ट्रसेवा की प्रेरणा है। उन्होंने शिक्षा को भारतीय संस्कृति, भाषा और परंपराओं से जोड़ने पर बल दिया। हिंदी भाषा के उत्थान में भी उनका योगदान अविस्मरणीय है। वे हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने के प्रबल समर्थक थे और इसके लिए उन्होंने अनेक मंचों पर संघर्ष किया।
स्वतंत्रता आंदोलन में भी महामना मालवीय की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के चार बार अध्यक्ष रहे और उन्होंने अहिंसा, संवाद और संवैधानिक मार्गों से देश को आज़ादी की ओर ले जाने में अहम योगदान दिया। वे मतभेदों के बावजूद समन्वय और संतुलन में विश्वास रखते थे, यही कारण था कि वे विभिन्न विचारधाराओं के बीच सेतु का कार्य करते थे।
सामाजिक सुधार के क्षेत्र में भी उनका योगदान उल्लेखनीय है। उन्होंने छुआछूत, अशिक्षा और सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध आवाज़ उठाई। उनका विश्वास था कि समाज की प्रगति तभी संभव है जब शिक्षा हर वर्ग तक पहुँचे और मानव को मानव के रूप में सम्मान मिले।
आज उनकी जयंती पर देशभर के शैक्षणिक संस्थानों, सामाजिक संगठनों और राजनीतिक मंचों पर उन्हें श्रद्धांजलि दी जा रही है। अनेक स्थानों पर संगोष्ठियाँ, व्याख्यान और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए गए, जिनमें उनके विचारों को वर्तमान संदर्भ में प्रासंगिक बताया गया। वक्ताओं ने कहा कि नई शिक्षा नीति, मूल्य-आधारित शिक्षा और भारतीय ज्ञान-परंपरा पर हो रही चर्चा में महामना मालवीय के विचार आज भी मार्गदर्शक हैं।
वर्तमान समय में, जब शिक्षा अक्सर केवल प्रतिस्पर्धा और बाजार से जुड़कर देखी जा रही है, महामना मालवीय का चिंतन हमें याद दिलाता है कि शिक्षा का अंतिम लक्ष्य एक जागरूक, नैतिक और राष्ट्रभक्त नागरिक का निर्माण है। उनका जीवन हमें सिखाता है कि व्यक्तिगत सफलता से अधिक महत्वपूर्ण सामाजिक दायित्व है।
मालवीय जी को भारत रत्न से मरणोपरांत सम्मानित किया जाना राष्ट्र की ओर से उनके योगदान की स्वीकारोक्ति है। आज उनकी जयंती पर देश उन्हें केवल स्मरण नहीं कर रहा, बल्कि उनके आदर्शों को आत्मसात करने का संकल्प भी ले रहा है।
महामना पंडित मदन मोहन मालवीय का जीवन और विचार आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का शाश्वत स्रोत बने रहेंगे।

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