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अरावली पर्वत श्रृंखला ओर सुप्रीम कोर्ट निर्देश

अरावली पर्वत श्रृंखला (Aravalli Range)
अरावली पर्वत श्रृंखला भारत की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है। इसका विस्तार मुख्य रूप से गुजरात, राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली तक फैला हुआ है।
मुख्य विशेषताएँ:
इसकी लंबाई लगभग 800 किलोमीटर है।
यह पर्वत श्रृंखला दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पूर्व दिशा में फैली हुई है।
अरावली की सबसे ऊँची चोटी गुरु शिखर (Mount Abu, राजस्थान) है, जिसकी ऊँचाई लगभग 1722 मीटर है।
यह क्षेत्र खनिज संपदा (जैसे संगमरमर, तांबा, जस्ता) के लिए प्रसिद्ध है।
अरावली पर्वत श्रृंखला थार मरुस्थल को पूर्व की ओर फैलने से रोकने में सहायक मानी जाती है।
महत्त्व:
यह राजस्थान की जलवायु और वर्षा को प्रभावित करती है।
कई नदियों जैसे बनास, लूनी और साबरमती का उद्गम यहीं से होता है।
यह जैव-विविधता और वन्यजीवों का महत्वपूर्ण क्षेत्र है।
📌 सुप्रीम कोर्ट का प्रमुख निर्णय — अरावली पर्वत श्रृंखला (20 नवंबर 2025)
अरावली की नई वैज्ञानिक परिभाषा
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार (पर्यावरण मंत्रालय) द्वारा प्रस्तुत वैज्ञानिक परिभाषा को स्वीकार किया, जिसके मुताबिक:
✔️ “अरावली हिल्स” वह भू-आकृतियाँ होती हैं जो आस-पास की सतह से कम से कम 100 मीटर ऊपर उठती हों।
✔️ “अरावाली रेंज” वे हिल्स/पर्वत हैं जिनमें **दो या अधिक ऐसे 100 मीटर से ऊपर वाले हिल्स 500 मीटर के भीतर हों”। �

खनन (Mining) पर फैसले के निर्देश
✔️ नई खनन लीज़ों (leases) को पूरी तरह रोका गया है — जब तक सस्टेनेबल माइनिंग प्लान (Sustainable Mining Plan) नहीं तैयार होता। �
✔️ मौजूदा वैध खनन गतिविधियाँ जारी रह सकती हैं, लेकिन कोई नई खनन गतिविधि बिना सुप्रीम कोर्ट/योजनानुसार अनुमति के नहीं। �
✔️ इसके लिए पर्यावरण मंत्रालय को ICFRE के माध्यम से प्रबंधित और सतत खनन योजना (Management Plan for Sustainable Mining) तैयार करनी होगी। �

पर्यावरणीय दृष्टि से दिशा-निर्देश (Ecological Protection)
🟢 कोर्ट ने कहा है कि “कोर एवं इंवायलेट ज़ोन” जैसे संरक्षित जंगल, वन्यजीव अभयारण्य आदि क्षेत्रों में खनन कठोर रूप से प्रतिबंधित रहेगा। �
🟢 कोर्ट ने अवैध खनन पर भी सख्त निगरानी रखने और पर्यावरण संतुलन की रक्षा के लिए दिशा-निर्देश दिया
📍 इस निर्णय के प्रभाव (समस्याएँ एवं बहस)
⚠️ पर्यावरण विशेषज्ञों और स्थानीय समुदायों का कहना है कि:
100 मीटर की इस ऊँचाई आधारित परिभाषा के कारण अब 90% से भी अधिक छोटे-ऊँचे अरावली इलाके कानूनी संरक्षण के दायरे से बाहर हो सकते हैं, क्योंकि वे 100 मीटर से कम हैं।
इससे खेती, जलस्तर, वायु-गुणवत्ता, पारिस्थितिकी संतुलन जैसे इको-सिस्टम पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।
⚠️ इसी वजह से राजस्थान और अन्य राज्यों में “Save Aravalli” आंदोलन तथा विरोध भी चल रहा है। �

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