
*भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ी 'उम्मीद': राजेसुल्तानपुर में विधवा महिला को आवास के लिए दर-दर की ठोकरें*
आलापुर अम्बेडकर नगर: एक तरफ सरकार 'बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ' और 'अन्त्योदय' जैसे नारों के साथ समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति को मुख्यधारा में लाने का दावा करती है, वहीं दूसरी तरफ स्थानीय स्तर पर बैठे जिम्मेदार अधिकारी और जनप्रतिनिधि इन दावों की धज्जियां उड़ा रहे हैं। ताजा मामला जनपद अम्बेडकर नगर के नगर पंचायत राजेसुल्तानपुर का है, जहां एक निराश्रित विधवा महिला प्रधानमंत्री आवास योजना (शहरी) के लाभ से वंचित है, जबकि वह विभागीय मानकों पर पूरी तरह खरी उतरती है।
दोहरी मार: सामाजिक बहिष्कार और प्रशासनिक उदासीनता
ग्राम राजेपुर शहरयार की मूल निवासी रीना गुप्ता (पत्नी स्वर्गीय दुर्गेश) की कहानी अत्यंत हृदयविदारक है। रीना ने वर्षों पहले अपनी इच्छा से अंतरजातीय विवाह किया था। इस साहसी कदम की सजा उन्हें उनके अपनों ने ही दी। पति की मृत्यु के बाद वह न केवल ससुराल से, बल्कि मायके से भी परित्यक्त (त्यागी हुई) कर दी गईं। आज वह इस समाज में पूरी तरह अकेली और अनाथ जीवन व्यतीत कर रही हैं।
राजस्व विभाग ने दी हरी झंडी, नगर पंचायत ने लगाया अड़ंगा
रीना गुप्ता की दयनीय स्थिति को देखते हुए स्थानीय राजस्व विभाग ने गहन सर्वे किया। सर्वे के बाद उनके अभिलेखों (Documents) की जांच हुई और उन्हें प्रधानमंत्री आवास योजना के लिए पात्र (Eligible) घोषित किया गया। लेकिन असली बाधा इसके बाद शुरू हुई।
आरोप है कि नगर पंचायत अध्यक्ष विनोद प्रजापति और अधिशासी अधिकारी (EO) लक्ष्मी चौरसिया इस फाइल को आगे बढ़ाने के बजाय टालमटोल कर रहे हैं। रीना जब भी कार्यालय के चक्कर काटती हैं, उन्हें सिर्फ "हो जाएगा" का खोखला आश्वासन देकर वापस भेज दिया जाता है।
भ्रष्टाचार और अवैध उगाही का गंभीर आरोप
पीड़िता और स्थानीय सूत्रों का दावा है कि इस देरी के पीछे अवैध धन उगाही का खेल चल रहा है। आरोप है कि जिन महिलाओं के परिवार आर्थिक रूप से सक्षम हैं, वे कथित तौर पर अध्यक्ष और अधिशासी अधिकारी को 'मोटा कमीशन' देकर अपना काम करवा ले रही हैं। लेकिन रीना गुप्ता जैसी बेसहारा महिला, जिसके पास न तो रसूख है और न ही रिश्वत देने के लिए पैसे, उसकी फाइल ईओ लक्ष्मी चौरसिया की मेज पर धूल फांक रही है।
"मेरे पास न तो मायका है, न ससुराल। सरकार की योजना ही मेरी आखिरी उम्मीद थी, लेकिन यहां साहब लोग बिना पैसों के बात ही नहीं करते। वे अपात्रों को आवास दे रहे हैं और मुझ जैसी अनाथ को केवल तारीखें मिल रही हैं।" — रीना गुप्ता (पीड़िता)
प्रशासनिक मौन पर उठते सवाल
राजस्व विभाग की रिपोर्ट के बावजूद अधिशासी अधिकारी द्वारा आवेदन को शासन तक न भेजना उनकी कार्यशैली पर बड़े सवालिया निशान खड़े करता है। क्या एक विधवा का अंतरजातीय विवाह करना या गरीब होना उसे सरकारी योजनाओं से वंचित रखने का आधार बन सकता है?
उच्चाधिकारियों से हस्तक्षेप की मांग
यह मामला जिले के वरिष्ठ अधिकारियों, विशेषकर जिलाधिकारी (DM) अम्बेडकर नगर के संज्ञान में लाने योग्य है। यदि पात्र होते हुए भी एक महिला को आवास नहीं मिल रहा, तो यह सीधे तौर पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के 'जीरो टॉलरेंस' नीति को चुनौती है।
स्थानीय निवासियों और जागरूक नागरिकों ने मांग की है कि रीना गुप्ता के मामले की निष्पक्ष जांच हो और दोषी अधिकारियों व जनप्रतिनिधियों पर कठोर कार्रवाई की जाए, ताकि एक निराश्रित महिला को छत मिल सके।