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कौन समझेगा पहाड़ की पीड़ा कहीं तेंदुआ तो कहीं भालू के हमले से लोगों की जा रही जाने

कौन समझेगा पहाड़ की पीड़ा?
तेंदुए और भालू के हमलों से दहशत, जान-माल दोनों पर संकट

पहाड़ी इलाकों में मानव और वन्यजीवों के बीच टकराव अब आम होता जा रहा है। तेंदुए और भालू के लगातार हो रहे हमलों से ग्रामीण क्षेत्रों में दहशत का माहौल है। कहीं किसी की जान जा रही है तो कहीं लोग गंभीर रूप से घायल हो रहे हैं। खेतों में काम करना, जंगल से चारा लाना या बच्चों का स्कूल जाना—हर कदम पर डर साया बनकर चल रहा है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि वन क्षेत्रों के सिमटने और जंगलों में भोजन की कमी के कारण वन्यजीव आबादी वाले इलाकों की ओर बढ़ रहे हैं। कई गांवों में पहले भी हमले हो चुके हैं, लेकिन ठोस समाधान आज तक नहीं निकल पाया। मुआवज़े की प्रक्रिया लंबी है और सुरक्षा इंतज़ाम नाकाफी।

ग्रामीणों की मांग है कि प्रभावित क्षेत्रों में नियमित गश्त, पिंजरे, सोलर लाइट, अलर्ट सिस्टम और त्वरित राहत टीमों की व्यवस्था की जाए। साथ ही, दीर्घकालिक समाधान के लिए जंगलों के संरक्षण और मानव-वन्यजीव संतुलन पर गंभीर नीति बनाई जाए।

आज सवाल यही है—कौन समझेगा पहाड़ की पीड़ा?
जब तक ठोस कदम नहीं उठाए जाते, तब तक पहाड़ के लोग हर दिन डर के साए में जीने को मजबूर रहेंगे।

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