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क्या अब जज भी धर्म देख कर जुज्मेंट सुना रहे हैं?? अगर नही तो फिर बहराइच दंगे में संलिप्त लोगों पर करवाई कियू नही सिर्फ सरफराज को फांसी की सजा कियू, ?

एक तरफ कहा जाता है आत्म सुरक्छा के लिए बल का परयोग करना हर भारतिए नागरिक की मौलिक अधिकारों में से एक अधिकार है तो इतनी बड़ी ज्यादती कियू, सिर्फ इसलिए के सरफराज मुसलमान है या फिर योगी आदित्यनाथ को UP विधान सभा के चुनाव किसी भी हालात में जीतना है, हाईकोर्ट के जज और सुप्रीम कोर्ट जज साहब से एक सवाल तो भारत के नागरिक होने के नाते बनता ही है, के हमको कानून सिर्फ एक धर्म के लोगों पर ही थोपना है, ताकि जब हम रेटायर हों तो गवर्नर या फिर राज्य सभा के चुने जा सकें, माफ कीजिए गा कुछ जुज्मेंट से यही परतित होता है...
हमने किताबों में पढ़ा था के हमारे देश हर एक नागरिक चाहे कोई जात धर्म का कियू ना हो सब के लिए कानून बराबर है पर अब ऐसा नही लगता है.. तब फैज़ अहमद फैज़ का एक शेर याद आता है
जिस देश के कोट कचहरी मे
इंसाफ टकों पर बिकता हो
जिस देश का मुंसिफ, काज़ी भी
मुजरिम से पूछ के लिखता हो
उस देश के हर एक हाकिम पर
सवाल उठाना लाज़िम....

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