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“मैडम, पैड महंगा होता है…” आईएएस अस्मिता लाल ने सुनी पुकार, ‘निरा’ बनकर आया बागपत का स्थायी समाधान

बागपत दिनांक 03 दिसंबर 2025 – अब न तो बागपत की महिलाओं और बालिकाओं की पहुँच से सुरक्षित पैड दूर रहेगा और न ही माहवारी की परेशानियों पर यह चुप्पी होगी। जिस मुद्दे पर कभी घरों में बात तक नहीं होती थी, वही समस्या जब मिशन शक्ति संवाद के दौरान स्कूलों में पढ़ने वाली बेटियों और गांव की महिलाओं ने सीधे जिलाधिकारी के सामने रखी, तो प्रशासन ने तय किया कि अब इस दर्द को अनदेखा नहीं किया जाएगा। हर माह होने वाली परेशानी, खर्च का बोझ, असुरक्षित साधनों का जोखिम और कचरे का संकट—इन सबका समाधान अब बागपत प्रशासन अपने साथ लेकर आया है। यह समाधान है ‘निरा’—कॉटन आधारित, सुरक्षित, पुन:प्रयोग योग्य सेनेटरी पैड, जो कल से जिले में महिलाओं और किशोरियों तक पहुंचने जा रहा है।


जिलाधिकारी आईएएस अस्मिता लाल के संवेदनशील नेतृत्व में रामा मेडिकल कॉलेज के सीएसआर और यूनिसेफ इंडिया एवं इंडियन रेड क्रॉस सोसायटी के सहयोग से कल नगर पालिका बड़ौत में रविदास मंदिर वार्ड संख्या 01 में दोपहर 12.00 बजे आयोजित विशेष समारोह में निरा पहल शुरू की जाएगी जिसमें महिलाओं को 100% कॉटन से बने री-यूज़ेबल सेनेटरी पैड उपलब्ध कराए जाएंगे जिन्हें दो से तीन साल तक इस्तेमाल किया जा सकता है। बागपत इस मॉडल को लागू करने वाला देश का प्रथम जिला है। इन पैड्स में प्लास्टिक या केमिकल का उपयोग नहीं किया गया है, जिससे संक्रमण का खतरा कम होता है और पर्यावरण पर भी बोझ नहीं पड़ता। यह महिलाओं की गरिमा, स्वास्थ्य और पर्यावरण सुरक्षा से जुड़ा संपूर्ण समाधान है। ये सुरक्षित हैं, प्लास्टिक-रहित हैं, केमिकल-रहित हैं और ग्रामीण परिवारों के लिए आर्थिक रूप से भी बेहद राहत देने वाले हैं।


बागपत में महंगे पैड की समस्या जितनी बड़ी है, उससे बड़ा संकट है डिस्पोज़ेबल पैड्स का बढ़ता कचरा। गांवों में नालियों, खेतों, सड़कों और कूड़ा स्थलों पर पड़े इस कचरे से संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है। कई जगह इन्हें जलाया भी जाता है, जिससे हवा, पानी और मिट्टी तीनों प्रभावित होती हैं। सफाई कर्मियों के लिए भी यह जोखिम का कारण बनता है। निरा इस समस्या को जड़ से कम करेगा, क्योंकि इसके पैड पर्यावरण-अनुकूल हैं और कचरा लगभग न के बराबर होता है। इसे देखते हुए प्रशासन मानता है कि री-यूज़ेबल पैड ही जिले के लिए सबसे व्यावहारिक विकल्प हैं।


बागपत में कुछ समय पहले हुए “महिलाओं संग हक की बात” कार्यक्रम और बालिका विद्यालयों में जिलाधिकारी के भ्रमण के दौरान जब कई लड़कियों और महिलाओं ने जिलाधिकारी के सामने माहवारी से जुड़ी अपनी दिक्कतें, खर्च का बोझ और सुरक्षित साधनों की कमी खुलकर बताई, तो जिलाधिकारी अस्मिता लाल ने वहीं तय कर लिया था कि इसका कोई टिकाऊ समाधान जिले को देना ही होगा। इसी संकल्प का परिणाम है कि कल से जिले में ‘निरा’ पहल शुरू होने जा रही है, जो महिला स्वास्थ्य और पर्यावरण—दोनों के लिए एक नया विकल्प लेकर आई है।


निरा की एक और खासियत यह है कि यह केवल पैड वितरण तक सीमित नहीं है। प्रशासन इस पहल को व्यापक जागरूकता अभियान के रूप में चलाएगा। कार्यक्रम में उपयोग की सही विधि, स्वच्छता के मूल नियम और संक्रमण से बचाव पर प्रशिक्षण दिया जाएगा। जिलाधिकारी के निर्देश पर महिलाओं के लिए सरल भाषा में उपयोग गाइड भी तैयार की गई है, जिसमें यह बताया गया है कि पैड को कैसे धोना, सुखाना और सुरक्षित रखना है।


महिलाओं में इस नई पहल को लेकर उत्साह भी दिख रहा है। निरा जमीनी जरूरतों से जुड़ा हुआ समाधान है। जिला प्रशासन की योजना इससे आगे बढ़कर भी है। आने वाले महीनों में स्वयं सहायता समूहों की महिलाओं को पैड निर्माण कार्य से जोड़ने पर विचार किया जा रहा है। इससे गांवों में स्थानीय स्तर पर रोजगार बढ़ेगा और महिलाएँ आर्थिक रूप से और सशक्त होंगी। स्कूलों में किशोरियों को विशेष निरा किट भी दी जाएगी, जिसमें पैड्स के साथ स्वच्छता पुस्तिका भी शामिल होंगी।


समग्र रूप से देखा जाए तो ‘निरा’ बागपत में महिलाओं के स्वास्थ्य, जागरूकता और पर्यावरण संरक्षण को एक साथ जोड़ने वाली पहल है। प्रशासन की कोशिश है कि यह पहल न केवल समस्या को कम करे, बल्कि जिले में एक नई सोच भी स्थापित करे—कि माहवारी जीवन की सामान्य प्रक्रिया है और इसे सुरक्षित, सम्मानजनक और पर्यावरण-अनुकूल तरीके से संभालना परिवार एवं समाज की जिम्मेदारी है।


जिलाधिकारी आईएएस अस्मिता लाल के नेतृत्व में बागपत में महिलाओं एवं बेटियों के लिए विशेष कार्यक्रम संचालित कर मिशन शक्ति को नई मजबूती दी जा रही है जिसमें हाल ही में आयोजित हमारी बेटी हमारी कुलदीपक, आंचल ब्रेस्टफीडिंग बूथ जैसी नवाचारी पहल शामिल है जिसमें अब निरा पैड्स मुहिम भी जुड़ गई।

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