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✍️ संपादकीय — किसान की बर्बादी का असली हिसाब, सरकार की झूठी MSP और खेतों की कराहती सच्चाई

मुकेश घोड़ेश्वर की कलम से
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भारत में लोकतंत्र को अगर किसी ने अपनी रीढ़ पर ढोया है, तो वह किसान है। लेकिन आज वही किसान टूट चुका है—नीतियों की विफलता से, बाजार की लूट से, और सरकार की बनावटी सहानुभूति से। सत्ता के मंचों पर “अन्नदाता” कहलाने वाला किसान व्यवहार में इस शासन का सबसे असहाय, सबसे शोषित नागरिक बन चुका है।
एक एकड़ मक्का और एक किसान का टूटता जीवन
किसानी सिर्फ फसल बोने और काटने का काम नहीं है। यह धरती से जीवन निकालने का संघर्ष है। एक किसान एक एकड़ मक्का उगाने में जो लागत लगाता है—वह किसी सरकारी रिपोर्ट का सूखा आंकड़ा नहीं, उसका खून–पसीना और भविष्य है।
बीज, जुताई, बोनी, खाद, कीटनाशक, मजदूरी, कटाई—यह सब मिलकर 27,700 रुपये प्रति एकड़। यह वही आंकड़ा है जिसे कोई मंत्रालय स्वीकार नहीं करता, कोई अधिकारी समझना नहीं चाहता और कोई नेता बोलता नहीं। उनके लिए MSP एक प्रेस विज्ञप्ति का शब्द है, किसानों के लिए यह आशा और अस्तित्व का प्रश्न।

सपना vs सच्चाई — MSP का धोखा

किसान 20 क्विंटल पैदावार की उम्मीद रखता है। MSP 2400 रुपये हो तो 48,000 की कमाई—यानी मेहनत का कुछ हिस्सा वापस। लेकिन हकीकत? 2024–25 ने इस उम्मीद को रौंद डाला।

मौसम ने साथ छोड़ा, बीज और खाद की उपलब्धता ध्वस्त रही, रोग और कीट के हमले बने रहे। कई जगह पैदावार 5 क्विंटल तक गिर गई। सबसे अच्छा खेत भी 12 क्विंटल तक ही पहुंच पाया। और बाजार? MSP 2400 की घोषणा भले थी, लेकिन खरीद नहीं। किसान 1300 रुपये प्रति क्विंटल पर बेचने को मजबूर हुआ—MSP से 1100 रुपये कम।

यानी सर्वोत्तम पैदावार पर भी किसान की जेब में 15,600 रुपये। और खर्च 27,700।
नतीजा: –12,100 रुपये का सीधा घाटा।
और अगर पैदावार 5 क्विंटल हुई?
–21,200 रुपये का नुकसान।
यह खेती नहीं, आत्मघाती अर्थव्यवस्था है। किसान फसल नहीं उगाता—नुकसान और निराशा उगाता है।

MSP: सरकार का प्रचार—किसान का मरण

सरकार MSP की घोषणा करती है, लेकिन खरीद केंद्र नहीं। किसानों से कहा जाता है—“MSP आपका हक है।” लेकिन हक सिर्फ कागज तक सीमित रहता है। हक की रक्षा करने वाली मशीनरी वहीं सोती है, जहां दलाल जागते हैं।

MSP का मतलब उत्पादन से सुरक्षा है। आज यह सिर्फ चुनावी रैली की पंक्ति बनकर रह गया है। किसान बाजार में गिरा पड़ा है—और सरकार MSP का पीठ थपथपाती पोस्टर थामे खड़ी है।

खाद की किल्लत—सरकारी विफलता का सबसे नग्न रूप

DAP और यूरिया—किसान के लिए जीवनरेखा। पर यह जीवनरेखा उसके हाथ नहीं आती। वह लाइन में खड़ा होता है, और गोदामों से ब्लैक मार्केटिंग का सोना बहता है। DAP 1400 की जगह 2000, यूरिया 900 की जगह 1500।

सरकार “उपलब्धि” गिनाती है। हकीकत? किसानों की जेब से प्रति बोरी 500–800 रुपये अतिरिक्त। हर बोरी खेत को नहीं, दलालों को सींचती है।

बीमा: कंपनी का मुनाफा—किसान की बर्बादी

फसल बीमा किसानों से प्रीमियम वसूलता है। नुकसान पर भुगतान नहीं देता। किसान कागज–कागज भटकता है। तहसील से बैंक, बैंक से ग्राम पंचायत। हर दरवाजा उसे कहता है—“जांच में है।” जांच कब खत्म होगी? तब जब किसान का धैर्य खत्म हो चुका होगा।

बीमा कंपनियां लाभ दिखाती हैं। किसान नुकसान में डूबता है। यह किराए का न्याय नहीं—संरचनात्मक शोषण है।

इस देश की अर्थव्यवस्था किसान से चलती है—किसान के रक्त से नहीं

आज सत्ता और बाजार का गठजोड़ किसी भी सरकारी रिपोर्ट से ज्यादा भयावह सच्चाई कहता है। जो अनाज उगाता है, वही भूख उगाता है। जो खेत बचाता है, वही कर्ज में डूबता है। जो देश को पेट भरता है, वही पेट काटकर बीज खरीदता है।

हर सीजन खेती एक जुआ है—लेकिन दांव किसान का जीवन है और कमाई दलालों की।

सरकार से सवाल: कब तक?

1. MSP पर खरीद क्यों नहीं? घोषणा से पेट नहीं भरता। क्रियान्वयन कहाँ है?

2. खाद की ब्लैक मार्केटिंग पर कार्रवाई क्यों नहीं? सिस्टम दलालों का है या किसानों का?
3. लागत बढ़ रही है, MSP स्थिर क्यों? क्या किसानों का जीवन मुद्रास्फीति से अछूता है?
4. फसल बीमा किसान के लिए कब? या यह सिर्फ बीमा कंपनियों का राजस्व मॉडल है?

किसान का दर्द, सरकार का मौन

किसान घाटा काटकर खेती करता है। बैंक से कर्ज लेता है। अपनी जमीन गिरवी रखता है। और अंत में यह सिस्टम उसे त्याग देता है।

सरकार टीवी पर दावा करती है—“किसानी लाभ का धंधा है।”
अगर यह लाभ है, तो नुकसान किसे कहते हैं?

किसान सिर्फ आंकड़ा नहीं—देश की आत्मा है

एक एकड़ में 20,000 रुपये तक का नुकसान। यह अर्थव्यवस्था नहीं—अन्नदाता के शोषण का मसौदा है। जिस देश का किसान डूब रहा हो, उस देश की राजनीति भले फल–फूल जाए, पर उसके समाज का भविष्य मरता है।

आज जरूरत सिर्फ भाषणों की नहीं—नीति बदलाव की है।
किसान नहीं चाहता दया। वह चाहता है न्याय।
एक चेतावनी, जिसे सत्ता सुनना नहीं चाहती
किसान अगर खेत छोड़ देगा, तो मंडी में न दलाल बचेगा, न मंत्री।
देश किसान पर चलता है—किसान घाटे पर नहीं।

सरकार जागे, या इतिहास उसे जगाएगा।

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