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मिले प्राण-प्यारे

बहरे मुतकारिब
मुसमन सालिम
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122 122 122 122
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निशा-पूर्णिमा की खिले चाँद-तारे।
हुआ अंत गम-का मिले प्राण-प्यारे।।

नहीं ख़्वाब-की ये कहानी समझना।
बिरह-की दवा बन मिले प्राण-प्यारे।।

अमर-बेल जैसी बढ़े प्रीति मेरी।
बसंती-छटा बन मिले प्राण-प्यारे।।

महकने लगी बाग-में रातरानी।
भँवर-बन सुमन से मिले प्राण-प्यारे।।

फिसलने लगी जब मिलन की गली में।
ठहरती-हवा बन मिले प्राण-प्यारे।।

हुआ चाँद कायल खिला-चाँद दिल का।
चमक-चाँदनी में मिले प्राण-प्यारे।।
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प्रभुपग धूल

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