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भाग 12 — मोक्षदा एकादशी एंव गीता जयंती: मोक्ष-दीप की पूर्ण ज्योति

भाग 12 — अंतिम उपसंहार : मोक्ष-दीप की पूर्ण ज्योति

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🕉️ अंतिम छंद (12×4 पंक्तियाँ)

(1)
मोक्षदा की पुण्य वेला अब, पूर्ण विराम को है आती,
मन करता है भाव समर्पित—जगद्धाता चरणों में जाती।
गीता जयंती की स्मृतियाँ, जीवन में अमृत बन जातीं,
जब साधक मन से स्वीकारे, हर शिक्षा प्रभु की अपनाती।

(2)
ज्ञान-योग का मधुर प्रकाश, भीतर का तम हर लेता है,
कर्म-योग की शीतल छाया, जीवन पथ सरल कर देता है।
भक्ति-योग का भाव अनोखा, प्रेम रूप से हृदय भरे,
तीनों मिलकर ही मोक्ष-द्वार का ताला सहज खोलें रे।

(3)
जिसने गीता को अपनाया, उसने जग को सही पढ़ा,
जीवन कितना सरल हो जाता, जब मन का बोझ वही कढ़ा।
कृष्ण-अर्जुन संवाद अमर है, यह हर युग की धड़कन है,
जो इसे हृदय में उतार ले, उसके भीतर प्रभु-चेतन है।

(4)
यह अंतिम भाग नहीं वास्तव में, यात्रा तो चलती रहती है,
मोक्ष-पथ का उजास साधक में, हर क्षण नई प्रेरणा कहती है।
प्रभु चरणों में भाव चढ़ाते, यह काव्य-श्रृंखला पूर्ण हुई,
हे साधक! जीवन में गीता रख, तुझमें ही परमात्मा प्रकट हुई।

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डिस्क्लेमर:-

यह रचना कवि 🖌️🖌️ सुरेश पटेल ‘सुरेश’ की मौलिक छंद-शैली कृति है;
इसके भाव, विचार एवं प्रस्तुति पूर्णत: लेखक के स्वत्वाधिकार में सुरक्षित हैं।
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