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दीवारों का बोझ नहीं, सपनों का बोझ ढोता है मज़दूर!

आज शहर की हर इमारत, हर चमक, हर सड़क पर रुककर देखिए। एक चेहरा दिखेगा - धूप से झुलसा हुआ, पसीने में तर। यह चेहरा है मज़दूर का। हम उसे 'लेबर' कहते हैं, पर वह सिर्फ़ 'श्रम' नहीं, वह इस देश की रीढ़ है, जिस पर हम अपने सपनों के महल खड़े करते हैं।
​वो हाथ, जो मिट्टी को सोना बना देते हैं
​क्या कभी आपने किसी मज़दूर को ग़ौर से देखा है? उसके हाथों पर ध्यान दीजिए। उन हाथों में छाले नहीं, हमारे कल की नींव है। वे हाथ लोहे को मोड़ते हैं, पत्थरों को तराशते हैं और कंक्रीट को आकार देते हैं। जब हम अपने एयरकंडीशंड कमरों में बैठकर 'विकास' की बातें करते हैं, तब यही मज़दूर खुली धूप में उस विकास की कहानी लिख रहा होता है।
​सवाल ये है: जो इंसान हमारी छत बनाता है, क्या उसके सिर पर अपनी पक्की छत है?
​सबसे सस्ती चीज़: मज़दूर की जान और उसका पसीना
​आज के बाज़ार में सब कुछ महंगा है – सीमेंट, सरिया, ईंट... पर सबसे सस्ती अगर कोई चीज़ है, तो वो है मज़दूर का पसीना और उसकी जान।
​वो एक दिन की दिहाड़ी के लिए सुबह कोसों दूर से आता है। उसके मन में 500 या 600 रुपये की उम्मीद होती है, जिससे उसके बच्चों को दो वक्त की रोटी मिल सके। लेकिन अक्सर क्या होता है?
​देरी से भुगतान: महीने भर की मेहनत के बाद भी उसे अपनी मज़दूरी के लिए गिड़गिड़ाना पड़ता है।
​शोषण: ठेकेदार उसका हिस्सा काट लेता है।
​असुरक्षित जीवन: काम की जगह पर सुरक्षा नहीं, ज़रा सी चूक और जिंदगी ख़तरे में।
​गरीबी का चक्र: वो कमाता है, खा लेता है, फिर अगले दिन कमाने निकल पड़ता है। क़र्ज़ और ग़रीबी का चक्र कभी नहीं टूटता।
​यह कैसा न्याय है कि जो समाज को बनाता है, वही समाज में सबसे कमज़ोर रह जाता है?
​जब वो लौटता है...
​शाम को, जब आप आराम से चाय की चुस्की लेते हैं, तो वो मज़दूर अपने मैले-कुचैले कपड़ों में थका-हारा लौटता है। उसकी आँखों में थकान नहीं, एक अजीब सी शांति होती है। ये शांति उस संतोष की है कि उसने आज किसी का घर बनाने में अपना पूरा दिन लगा दिया।
​वो लौटकर देखता है कि उसकी बस्ती में अब भी अँधेरा है, बच्चों के चेहरे पर मायूसी है, पर वो फिर भी मुस्कुराता है। उसकी मुस्कान में एक विश्वास होता है: कल फिर मेहनत करूंगा, क्योंकि मेरे हाथों में सिर्फ़ औज़ार नहीं, मेरी औलाद का भविष्य है!

​एक अपील,

​अगली बार जब आप किसी मज़दूर को देखें, तो उसे सिर्फ़ काम करने वाला इंसान न समझें।
​उसे उसका हक़ दें, समय पर उसकी मज़दूरी दें, और उससे इंसानियत से पेश आएँ।
​याद रखिए, हमारा वजूद उनकी मेहनत पर टिका है। उनकी मज़दूरी सिर्फ़ पैसा नहीं, उनके सपनों की किश्त है।
​इस आर्टिकल को शेयर करें, ताकि हर कोई इस अनदेखी मेहनत को सम्मान दे सके।

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