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कामरेडों की हवाई राजनीति


पिछले दिनों लाल सलाम वालों की खूब गहमागहमी रही जगह जगह एक शहर से दूसरे शहर जलसों की भरमार रही कुछ नये लीडर चुने गए कुछ की तरक्की की गई मैं डी राजा के सिवा किसी को नहीं पहचानता इस लिए एक दो को छोड़कर किसी का नाम नहीं जानता।चुंकि मुझे सीता राम येचुरी तक कामरेडों में गहरी दिलचस्पी थी उनके बाद प्रकाश करात और उनकी धर्मपत्नी ब्रिंदा करात ने लाल सलाम के अलम्बरदारों को ऐसा ठिकाने लगाया कि आज तक संभल नहीं पा रहे। यहां तक आज़ाद भारत के इतिहास में पहली बार भारत के लोग मोजुदा सरकार के दौर में त्राहि-त्राहि कर रहे हैं पूंजीवादियों ने लोगों की नाक में दम कर रखा है। महाराज अधिराज और उनके गुर्गे अपने लच्छेदार भाषणों से सरे आम जनता की जेब पर डाका डाल रहे हैं। ये सिलसिला गियारह साल से जारी है लेकिन इसके खिलाफ किसी कामरेड ने आवाज़ उठाई हो याद नहीं पड़ता। मुझे पिछले काफी दिनों से ये बात खल रही थी इसलिए जब देश के कई हिस्सों लाल झंडे लहरा रहे थे तो मैंने अपनी पोस्ट में लिख दिया " क्या उखाड़ लोगे"
मेरी इस पोस्ट से लाल सलाम वाले लाल पीले हो गए और जवाब में लिखा " इतिहास पढ़ो पता चल जाएगा कि हमने क्या क्या उखाड़ा है" जी में आया कि बोल दूं कमबखतो ये जो नरेंद्र दामोदरदास मोदी नाम का प्राणी सत्ता आसिन है तुमाहारी वजह से है। आप लोग सोच रहे होंगे मेने कहीं भांग तो नहीं पी ली कहां लाल सलाम कहां भगवा ब्रिगेड?। जी नहीं मैं पूरे होश में हूं। 1996 में 13 पार्टी के युनाइटेड फ्रंट ने लोकसभा चुनाव में अच्छी खासी सीटें हासिल की थीं। इस फ्रंट में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी भी शामिल थी और सोलाह साल तक पश्चिमी बंगाल के मुख्यमंत्री रहे ज्योती बासू को प्रधानमंत्री बनाए जाने का रास्ता पूरी तरह साफ था मगर एन वक्त पर पोलिट ब्योरो ने अपनी दावेदारी वापिस ले ली। ज़रा सोचिए अगर ज्योती बासू प्रधानमंत्री बना दिए गए होते तो आज भारत की राजनीतिक तस्वीर कुछ और ही होती और भाजपा आज भी सत्ता के लिए एड़ियां रगड़ रही होती।
देसराज मुज़तर

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