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उफ़ उर्दू से नफ़रत

उफ़! इतनी नफ़रत कि सदियों पुरानी एक ज़बान बर्दाश्त नहीं हो रही। सरकारी फरमान जारी किया गया है कि जो चैनल समाचारपत्र हिंदी के होते हुए उर्दू भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं वो तुरंत प्रभाव से उर्दू शब्दों का इस्तेमाल बंद कर दें। हैरत है कि ऐसे लोगों के मुंह में अब तक किसी को कापर टी लगाने का ख्याल क्यों नहीं आया जिनको ये नहीं पता कि उर्दू और हिंदी गंगा जमुना तहज़ीब की कोख से पैदा हुई हैं। एक बार एक विद्वान ज्ञानियों की सभा में बैठे थे और बहस यह थी की'‌ उर्दू है क्या? विद्वान ने कहा कि हम यहां बैठे जो बातचीत कर रहे हैं दर असल यही उर्दू है। उर्दू में जो भारी भरकम शब्दों का इस्तेमाल होता है या तो अरबी हैं या फारसी हैं या पश्तो हैं या कोई और है वह उर्दू नहीं है यू उर्दू तीन भाषाओं के मिलन से बनी है अरबी फारसी और संस्कृत। इनको छाना गया और अलग-अलग किया गया तो यह भाषा खत्म हो जाएगी। खेर छोड़िए बात हो रही है सरकारी फरमान की जिसमें कहा गया है कि हिंदी में उर्दू का प्रयोग ना किया जाए ।उर्दू का प्रयोग बंद करने का मतलब है समाचार संस्कृत में होंगे और संस्कृत किसी को आती नहीं है। देश की 90% आबादी अंग्रेजी से पहले ही कंगाल है संस्कृत ज्योतिषियों और पंडितों तक सीमित होकर रह गई है एक अरब 40 करोड़ आबादी को आप क्या बताना चाहते हैं यही न की एक और बंटवारे की नीव रखी जाएगी।

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