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फसल बीमा योजना किसानों के साथ एक धोखा है और भाजपा सरकार इसपर चुप है–नरेंद्र मोर

फसल बीमा योजना किसानों के साथ एक धोखा है और भाजपा सरकार इसपर चुप है–नरेंद्र मोर, अध्यक्ष इनेलो खेल प्रकोष्ठ

प्रदेश के 12 जिलों में धान की फसल बाढ़ व जलभराव के कारण पूरी तरह तबाह हो चुकी है — और यह तबाही केवल खेतों तक सीमित नहीं, बल्कि हजारों परिवारों की सारी सालाना आमदनी को चकनाचूर कर चुकी है। किसानों ने समय पर प्रीमियम अदा किया, उन्होंने भरोसा किया कि संकट की घड़ी में बीमा कवच काम आएगा। मगर अब वही बीमा कंपनियाँ दावे मानने से कतरा रही हैं और राहत देने की ज़िम्मेदारी टाल रही हैं — जबकि सरकार के पास मामले में हस्तक्षेप करने और किसानों का बचाव करने के पूरे अधिकार व संसाधन मौजूद हैं।

यहाँ सवाल बेझिझक उठता है — क्या यह अदूरदर्शिता या स्पष्ट उदासीनता है कि भाजपा शासित राज्य सरकारें ऐसे समय में बीमा कंपनियों पर कड़ी कार्रवाई नहीं करतीं? देश में प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY) जैसी योजनाओं के तहत अब तक करोड़ों आवेदन कवर किए जा चुके हैं और केंद्रीय स्तर पर भी बड़े बजट आवंटित किए जाते रहे हैं — फिर भी ज़मीन पर मिलने वाला मुआवज़ा अक्सर अपर्याप्त, देर से और कई मानदंडों में किसानों के हित के विरुद्ध रहा है। इससे किसान-सरकार-बीमाकर्ता के बीच भरोसा दरकता है।

सरकार द्वारा भी जो मुआवज़ा प्रस्तावित किया जा रहा है, वह धान की वास्तविक लागत — जो 20–25 हजार रुपये प्रति एकड़ होती है (यदि प्याेद, खाद, दवाई, पानी जिसमें व्यक्ति की मजदूरी शामिल नहीं) — के लिए भी काफी कम है। साथ ही बीमा दावों में कटौती, नुकसान की ‘लोअर-थ्रेशहोल्ड’ के आधार पर बहिष्कार और लंबे गतिमान सत्यापन प्रक्रियाओं ने किसानों की पीड़ा को और बढ़ा दिया है। ऐसे में यह सवाल होना लाजिमी है कि प्रशासन किस आधार पर बीमा कंपनियों को इन छूटों की इजाज़त दे रहा है।

किसान प्रीमियम इसलिए देते हैं कि आपदा में उन्हें समय पर और पर्याप्त मुआवज़ा मिले। जब दावे निपटाने का समय आता है और बीमा कंपनियाँ नियम-कायदों की आड़ लेकर अनिर्णय करती हैं, तो यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं — यह एक तरह की सामाजिक बेवफाई है। भाजपा सरकार से अपेक्षा यही की जाती है कि वह तुरंत हस्तक्षेप करे: पारदर्शी ऑडिट करवाए, दावों का त्वरित निपटान सुनिश्चित कराए, और यदि बीमा कंपनियाँ शर्तों का उल्लंघन कर रही हों तो कड़े नियामक एवं वैधानिक कदम उठाए जाएँ। वरना किसानों का यह भरोसा और बढ़ती असंतोष भविष्य में बड़े आंदोलन व राजनैतिक नाकामी में बदल सकता है।

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