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राजस्थान मेवाड़ क्षेत्र का प्रसिद्ध गवरी नृत्य

गवरी नृत्य ( राई नृत्य ) , राजस्थान के मेवाड़ क्षेत्र में भील जन जाति द्वारा किया जाने वाला लोक नाट्य हैं,
जिसका उद्गम शिव और भस्मासुर की पौराणिक कथा से माना जाता हे। यह नृत्य सावन ओर भादो माह में किया जाता है।
और यह लगभग 40 दिन तक तपस्या करते हैं इसमें 20 से लेकर 50 लोगों की टीम होती हैं। और इस नृत्य को जिस गांव से शुरू करते उसी गांव से उसका एंडिंग भी करते हैं।इसमें बुढ़िया, ( शिव ) और राई माता , ( पार्वती ) मुख्य पात्र होते हैं। इस उत्सव के दौरान कलाकार संयम और तपस्या का जीवन जीते हुए विभिन्न सामाजिक संदेशों को दर्शाते हैं।
पौराणिक कथा और उत्पति,
शिव और भस्मासुर की कथा।
गवरी नृत्य का कथानक भगवान शिव और भस्मासुर से जुड़ा हुआ हैं । मान्यता हैं कि भस्मासुर ने वरदान प्राप्त कर शिव को ही भस्म करने का प्रयास किया। जिसमें विष्णु ने मोहिनी का रूप धारण कर भस्म किया।
देवी अम्बा व गोरी ( पार्वती ) का महत्व
जिन्हें भील समाज की प्रमुख देवी माना जाता है,
कुछ मान्यताओं के अनुसार , यह देवी अम्बा और गोरी ( पार्वती ) को समर्पित हैं,
नृत्य का स्वरूप इस प्रकार:
पात्र :_
इसमें बुढ़िया ( शिव का प्रतीक और राई माता ( पार्वती का प्रतीक मुख्य पात्र होते हैं ।
अवधि:
गवरी उत्सव लगातार 40 दिनों चलता है। ओर पूरे दिन चलता है
गवरी देवी का जन्म:
गवरी देवी_ राजस्थान के महान लोक गायकों में की जाती हैं. ओर श्री कृष्ण की भक्त बताते हैं ओर मीरा का अवतार भी माना जाता हैं और गवरी बाई को वागड़ की मीरा बाई के नाम से भी जाना जाता है

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