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ड्यूटी फ्री कपास आयत से आफत में किसान

सत्यवीर सिंह 'मुनि'
भारत में कपास की खेती न केवल एक पारंपरिक कृषि गतिविधि है, बल्कि यह लाखों किसानों की रोज़ी-रोटी से जुड़ी हुई है। देश के वस्त्र उद्योग की रीढ़ बनने वाली यह फसल हर साल करोड़ों लोगों को प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से रोजगार देती है। ऐसे में जब केंद्र सरकार ने हाल ही में कपास के आयात पर लगने वाले 11 प्रतिशत शुल्क को अस्थायी रूप से हटा दिया, तो यह निर्णय जहां एक ओर कपड़ा उद्योग के लिए राहत की खबर बना, वहीं दूसरी ओर देश के किसानों के लिए चिंता का विषय बन गया। ड्यूटी-फ्री कपास आयात की अनुमति से विदेशी कपास भारतीय बाज़ार में कम दामों पर उपलब्ध हो जाएगी, जिससे स्वाभाविक रूप से घरेलू कपास की कीमतों में गिरावट आएगी। यह स्थिति पहले से ही लागत, मौसम और बाज़ार की अनिश्चितताओं से जूझ रहे भारतीय किसानों के लिए आर्थिक रूप से नुकसानदायक साबित हो सकती है।
सरकार का तर्क है कि यह निर्णय फिलहाल अस्थायी है और केवल 30 सितंबर 2025 तक के लिए लागू किया गया है, ताकि टेक्सटाइल उद्योग को महंगे कच्चे माल की समस्या से राहत मिल सके। उद्योग संगठनों का कहना है कि बीते एक वर्ष में घरेलू उत्पादन कम होने और वैश्विक कीमतों में बढ़ोत्तरी के कारण लागत काफी बढ़ गई थी। ऐसे में यदि आयात शुल्क हटाकर सस्ती कपास मंगाने की छूट दी जाती है, तो इससे कपड़ा निर्माण लागत घटेगी और भारत वैश्विक प्रतिस्पर्धा में बने रह सकेगा। इस फैसले का एक पक्ष यह भी है कि अगर उत्पादन लागत नियंत्रित होती है, तो वस्त्र महंगे नहीं होंगे और महंगाई भी सीमित रहेगी। इसके साथ ही वस्त्र उद्योग में जुड़े लाखों श्रमिकों के रोजगार पर भी प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा।
किसानों की बात करें तो गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, तेलंगाना जैसे राज्यों में कपास प्रमुख फसल है, और इन इलाकों के लाखों किसानों ने इस फैसले पर तीव्र असंतोष जताया है। उनका कहना है कि जब भारतीय किसान प्राकृतिक आपदाओं, कीट प्रकोप, खाद और बीज की लागत, और बाजार की अनिश्चितताओं से जूझते हुए उत्पादन करता है, तो सरकार को उसकी उपज की कीमत सुनिश्चित करनी चाहिए, न कि विदेशी कपास को बढ़ावा देना चाहिए। किसान संगठनों का आरोप है कि ड्यूटी-फ्री आयात की छूट से घरेलू मंडियों में कपास के दाम गिरने शुरू हो गए हैं। कई जगहों पर तो कीमतें न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से भी नीचे चली गई हैं। यह स्थिति छोटे और सीमांत किसानों को बुरी तरह प्रभावित कर सकती है, क्योंकि उनकी पूरी साल की मेहनत और निवेश की भरपाई भी नहीं हो पाएगी।
समय की मांग है कि कपड़ा उद्योग को राहत देने और किसानों के हितों के बीच संतुलन बैठाने की ज़रूरत है। यह बात सही है कि उद्योग को समय-समय पर समर्थन की ज़रूरत होती है, लेकिन अगर यह समर्थन किसानों की कीमत पर हो, तो वह दीर्घकालिक रूप से लागू नहीं हो सकता। भारत में ग्रामीण अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा कृषि पर आधारित है, और यदि किसानों की आय कम होती है, तो इसका असर अन्य क्षेत्रों पर भी पड़ेगा। ग्रामीण बाज़ार कमजोर होंगे, मांग घटेगी और इससे देश की समग्र आर्थिक गति धीमी हो सकती है। इसके अतिरिक्त, यदि किसान कपास की खेती को घाटे का सौदा समझने लगेंगे तो वे कपास की खेती से दूरी बना सकते हैं, जिससे भारत का आत्मनिर्भर उत्पादन भी प्रभावित होगा और भविष्य में आयात पर निर्भरता बढ़ जाएगी।
आवश्यकता इस बात की है कि सरकार ऐसी नीतियां बनाए जो दोनों पक्षों उद्योग और किसानों की ज़रूरतों को समझते हुए संतुलन साधें। किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य की कानूनी गारंटी, फसल बीमा और भावांतर योजना जैसी सुविधाएं मिलें, तो वे बाज़ार के उतार-चढ़ाव से सुरक्षित रहेंगे। साथ ही टेक्सटाइल उद्योग को भी यह सुनिश्चित करना होगा कि वे केवल आयात पर निर्भर न होकर, देशी उत्पादन को भी बढ़ावा दें। उच्च गुणवत्ता वाली भारतीय कपास के ब्रांड को वैश्विक बाज़ार में स्थापित किया जाए, जिससे किसान को भी लाभ मिले और उद्योग को भी गुणवत्ता युक्त कच्चा माल मिले।
ड्यूटी-फ्री आयात का फैसला जितना आर्थिक है, उतना ही सामाजिक और राजनीतिक भी है। एक तरफ अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में भारत की स्थिति को मज़बूत बनाए रखना ज़रूरी है, वहीं दूसरी ओर देश के किसान की मेहनत और सम्मान की रक्षा करना भी अनिवार्य है। किसी भी नीति की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि वह सभी पक्षों की ज़रूरतों और समस्याओं को ध्यान में रखकर बनाई गई हो। किसान केवल उत्पादन करने वाला नहीं है, वह भारत की आत्मा है, यदि उसकी उपेक्षा हुई तो देश की नींव भी हिल सकती है। इसलिए यह ज़रूरी है कि ऐसी हर नीति, जो कृषि से जुड़ी हो, वह किसान की भागीदारी और संरक्षण सुनिश्चित करते हुए ही लागू की जानी चाहिए।

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