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एनआरसी–सीएए और SIR: लोकतंत्र पर काला साया

✍️ मोहम्मद जावेद की कलम से

एनआरसी–सीएए और SIR: लोकतंत्र पर काला साया

क्या यह संभव है कि एक ऐसा सैनिक, जिसने सरहद पर दुश्मनों से लोहा लिया, कारगिल युद्ध में बहादुरी दिखाई और तीन दशक तक सेना में सेवा की, उसे अपने ही देश में “विदेशी” कहकर कैद कर दिया जाए? असम के रिटायर्ड कैप्टन मोहम्मद सनाउल्लाह के साथ यही हुआ।

एनआरसी प्रक्रिया की त्रुटियों ने उन्हें फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल की नज़र में विदेशी बना दिया और गुवाहाटी के पास डिटेंशन कैंप में डाल दिया गया। यह केवल एक सैनिक की नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र की अंतरात्मा को झकझोर देने वाली घटना थी।

कौन है ज़िम्मेदार?
इस शर्मनाक अन्याय की ज़िम्मेदारी केवल एक दफ़्तर या एक अधिकारी पर नहीं थोपी जा सकती। यह उस प्रशासनिक असंवेदनशीलता का परिणाम था जिसने एक फौजी की नागरिकता पर सवाल खड़ा कर दिया। यह उन कानूनों की खामी थी, जिनके नाम पर नागरिकों को शक की नज़रों से देखा गया। और यह उस राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी का भी सबूत था, जिसने समय रहते न्याय सुनिश्चित नहीं किया।

बिहार का SIR विवाद
असम की त्रासदी से सबक लेने के बजाय, आज बिहार में चल रही विवादित SIR (Special Survey for Identification of Residents) प्रक्रिया भी वैसी ही खामियाँ दोहरा रही है।

लाखों नागरिक दस्तावेज़ी गड़बड़ियों और नाम–पते की छोटी गलतियों के कारण परेशानी झेल रहे हैं।

गरीब, बुज़ुर्ग और अशिक्षित लोग दफ़्तरों के चक्कर काट रहे हैं।

यह सर्वेक्षण नागरिकों की गरिमा की रक्षा करने के बजाय उन्हें संदेह के घेरे में खड़ा कर रहा है।


स्पष्ट है कि चाहे एनआरसी हो या SIR—इन प्रक्रियाओं में आम नागरिक की पीड़ा और संवैधानिक अधिकारों की अनदेखी की जा रही है।

संविधान की जीत और लोकतंत्र की हार
7 जून 2019 को उच्च न्यायालय ने मोहम्मद सनाउल्लाह को रिहा करने का आदेश दिया। यह संविधान और न्यायपालिका की ताक़त का प्रमाण था। परंतु सवाल यह है कि क्या अदालत का यह फ़ैसला उस अपमान को मिटा पाया, जो उन्होंने झेला?

सनाउल्लाह की रिहाई संविधान की जीत थी, लेकिन उनकी गिरफ्तारी लोकतंत्र की सबसे बड़ी हार। यही संदेश बिहार की SIR प्रक्रिया से भी उभरता है—यदि तुरंत सुधार नहीं किए गए तो यह नागरिकों को अविश्वास और असुरक्षा के अंधकार में धकेल देगा।


सबक और चेतावनी

आज ज़रूरत इस बात की है कि हम संविधान की मूल आत्मा को याद रखें।

न्याय – ताकि कोई निर्दोष नागरिक कागज़ों की भूल के कारण विदेशी न ठहराया जाए।

स्वतंत्रता – ताकि नागरिक भय और संदेह से मुक्त रह सकें।

समानता – ताकि गरीब और कमजोर को भी वही सम्मान मिले जो संपन्न और ताक़तवर को मिलता है।

बंधुत्व – ताकि हम अपने ही लोगों को “पराया” न बना दें।

निष्कर्ष
मोहम्मद सनाउल्लाह का मामला केवल एक सैनिक का नहीं, बल्कि भारत के लोकतंत्र की परीक्षा थी। और आज बिहार की SIR प्रक्रिया हमें वही चेतावनी दे रही है।

यदि हम संविधान की आत्मा को केंद्र में नहीं रखेंगे, तो आम नागरिक का भरोसा डगमगाता रहेगा और लोकतंत्र की नींव खोखली हो जाएगी।

राष्ट्र की मज़बूती नागरिकों की गरिमा और अधिकारों की रक्षा में ही है—यही सच्चाई है, यही कर्तव्य है।



✍️ मोहम्मद जावेद

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