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वृद्ध होता कला और और संघर्षरत कलाकार

एक तरफ आज के मानव जीवन से लगभग संपन्न और संतुष्ट प्रभु के भक्त जो प्रभु के दर्शन के लिए जा रहे हैं, नए नए रंग बिरंगे बोल बम कांवरियां वस्त्र पहने अपने टोली के संग इस यात्रा का आनंद लेते हुए।
और इन सब के बीच एक और प्रभु के वृद्ध अंधे भक्त जो अपने इस प्रस्तुति के माध्यम से ट्रेन में जा रहे रंग बिरंगे कपड़े से सुशोभित भक्त टोली का मनोरंजन कर रहे हैं पूर्णतः आर्थिक उद्देश्य से भोजन के लिए जीवन के लिए अपने संघर्ष की पराकाष्ठा से कला और जीवन के संगम को दिखा रहे हैं।
आधुनिक कलाकारों, कलाओं , श्रोताओं और दर्शकों के भीड़ में ये लोक कला भी कहीं उम्र के साथ वृद्ध होते हुए मरने के लिए समाज में संघर्ष कर रही है, ऐसे कुछ विशेष कलाकारों के साथ ये कलाएं भी गीत भी कहानी, इतिहास भी संस्कृति भी पहचान भी संघर्ष कर रही है उस आधुनिक रात में सो जाने का थक कर, मर जाने का वृद्ध होकर, कमजोर होकर , महत्व के खत्म हो जाने के कारण।
संदीप कुमार मिश्र
Sandeep Mishra
बांका बिहार

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