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शिक्षा का महंगा होता चेहरा और गरीबों का संघर्ष

शिक्षा को संविधान ने प्रत्येक नागरिक का मूल अधिकार माना है। इसे एक ऐसा साधन माना गया है जो व्यक्ति को न केवल आत्मनिर्भर बनाता है, बल्कि पूरे समाज को जागरूक और विकसित करता है। परन्तु, दुर्भाग्यवश आज की तारीख में शिक्षा एक अधिकार नहीं, एक "व्यापार" बनती जा रही है — और इसका सबसे बड़ा खामियाजा उठाते हैं गरीब और मध्यमवर्गीय परिवार।

आज के भारत में निजी स्कूलों, कॉलेजों और कोचिंग संस्थानों की फीस आसमान छू रही है। पहली कक्षा से लेकर स्नातकोत्तर तक की पढ़ाई अब लाखों रुपये में हो रही है। यहाँ तक कि दाखिला शुल्क, यूनिफॉर्म, किताबें और अन्य सुविधाओं के नाम पर भी मोटी रकम वसूली जाती है। एक मजदूर, एक किसान, या एक दिहाड़ी पर काम करने वाला व्यक्ति भला अपने बच्चों को कैसे पढ़ा सकता है?

**शिक्षा की वाणिज्यीकरण की प्रवृत्ति** ने उसे आम जनता की पहुँच से दूर कर दिया है। जहां एक ओर निजी संस्थान शिक्षा को लाभ का माध्यम बना चुके हैं, वहीं दूसरी ओर सरकारी संस्थान संसाधनों की कमी से जूझ रहे हैं। सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की भारी कमी, खराब आधारभूत संरचना और घटती गुणवत्ता के कारण अब गरीब भी वहाँ अपने बच्चों को भेजने से कतराने लगे हैं।

सरकारी योजनाएं जैसे 'मिड डे मील', 'आरटीई' (Right to Education Act), और 'प्रधानमंत्री शिक्षा योजना' अपने-अपने स्तर पर प्रयास कर रही हैं, लेकिन जब तक जमीनी स्तर पर इनका प्रभाव नहीं दिखेगा, तब तक वास्तविक बदलाव संभव नहीं है। शिक्षा को केवल कागजों पर नहीं, बल्कि व्यवहार में भी "सुलभ और सस्ती" बनाना होगा।

**दूसरी ओर कोचिंग उद्योग का तेजी से फैलता दायरा** भी शिक्षा को महंगा बना रहा है। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के नाम पर लाखों रुपये की फीस वसूल की जाती है, जिससे केवल आर्थिक रूप से सक्षम वर्ग ही लाभ ले पाता है। आज अगर कोई छात्र डॉक्टर या इंजीनियर बनने का सपना देखता है, तो पहले उसे अपनी जेब की स्थिति देखनी पड़ती है।

**क्या यह वही भारत है जो "सबको शिक्षा" की बात करता है?** क्या यह वही समाज है जो "शिक्षा से विकास" का सपना देखता है? अगर शिक्षा अमीरों की जागीर बनकर रह जाएगी, तो गरीबी कभी मिट नहीं सकती। शिक्षा ही एकमात्र रास्ता है जिससे कोई गरीब अपना भविष्य बदल सकता है, लेकिन जब यही रास्ता बंद हो जाए, तो उसके पास केवल निराशा और संघर्ष ही बचता है।

**अब समय आ गया है कि सरकार शिक्षा के व्यवसायीकरण पर लगाम लगाए।**

* निजी संस्थानों की फीस पर नियंत्रण हो
* सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता सुधारी जाए
* गरीब बच्चों को मुफ्त और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिले
* डिजिटल शिक्षा को गाँवों तक पहुँचाया जाए
* और स्कॉलरशिप योजनाओं को अधिक पारदर्शी और व्यापक बनाया जाए

हमारा संविधान कहता है — *"सभी को समान अवसर मिलना चाहिए।"* पर आज की व्यवस्था इस बात को झुठला रही है। अगर समाज को सच में बदलना है, तो शिक्षा को सस्ती, सुलभ और समान रूप से सबके लिए उपलब्ध कराना होगा। तभी गरीब का बच्चा भी डॉक्टर, इंजीनियर, शिक्षक या वैज्ञानिक बनने का सपना देख पाएगा — और उसे पूरा भी कर पाएगा।

✍️ **– एक जागरूक नागरिक**

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