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हमे सौभाग्य से ही मिलता है भागवत कथा को श्रवण करने का अवसर : कृष्ण कांत शाडिल्य ।।

हमे सौभाग्य से ही मिलता है भागवत कथा को श्रवण करने का अवसर : कृष्ण कांत शाडिल्य ।।
सराहां 3 जुलाई

हमारे सौभाग्य जब जब का उदय होता है तब तब हमे भागवत कथा सुनने मिलती है। भगवान सत्य स्वरूप हैं। चित्त स्वरूप हैं। आनंद स्वरूप हैं। दैहिक, देविक, भौतिक तापों का हरण करने वाले हैं। यह बात कृष्ण कांत शाडिल्य ने शिव मंदिर समिति हाब्बन रोड़ राजगढ़ द्वारा स्थानीय जनता के सहयोग से क्षेत्र की सुख शांति एवं सुख स्मृद्वि के साथ साथ प्राकृतिक आपदाओं से रक्षा हेतु आयोजित श्री मद्भागवत के कथा प्रवचन मे कही । उन्होंने कहा कि सूतजी महाराज ने 88 हजार ऋषियों को नैमीशारण्य में भागवत कथा सुनाई थी। उन्होंने कहा कि भागवत का अर्थ है भक्ति, ज्ञान, वैराग्य और तारण है यह कथा प्रेत योनि से मुक्त करने वाली भागवत कथा है।
धुंधकारी और गौकर्ण की कथा बताते हुए शाडिल्य ने कहा कि आत्मदेव ब्राह्मण की कोई संतान नहीं थी। निराश ब्राह्मण को एक संत ने फल दिया, कहा पत्नी को खिलाना लाभ होगा। उसने फल स्वयं न खाकर गाय को दे दिया और पति से झूठ बोल दिया। समय पूर्ण होने पर पत्नी धुंधली ने अपनी बहन का पुत्र लिया और स्वयं का बताकर नाम धुंधकारी रखा। उसी समय गाय को भी पुत्र हुआ, जिसका नाम गौकर्ण रखा गया। धुंधकारी अत्याचारी, अहंकारी था जबकि गौकर्ण विद्वान था। धुंधकारी से परेशान ब्राह्मण वन गमन कर गए। मां धुंधली ने परेशान होकर आत्महत्या कर ली। धुंधकारी की वेश्याओं ने निर्मम हत्या कर दी। असमय मौत ने उन्हें प्रेत बना दिया। परिजनों की मुक्ति की आकांक्षा से गौकर्ण ने भागवत सप्ताह यज्ञ कराया। जिससे प्रेत योनि से मुक्ति मिली।
शांडिल्य ने कहा कि आत्मा का परमात्मा से मिलन ही वास्तव में होता है उन्होंने कहा कि भगवान कृष्ण की लीलाओं को समझना साधारण बुद्धि के लोगों का कार्य नहीं है। भगवान कृष्ण ने जब महारास रचाया था तो वह मात्र आठ वर्ष के थे। उन्होंने कहा कि वास्तव में गोपियाँ पिछले जन्मों की साधक थी और सांसारिक मोह माया को त्याग कर उन्होंने कृष्ण के भगवत रूप को महारास में प्राप्त करके मोक्ष का मार्ग प्रशस्त किया था। उन्होंने इससे पूर्व भगवान कृष्ण की बाल लीलाओं का विस्तृत वर्णन किया।
शांडिल्य ने कहा कि पैरों में पहनने वाला जुता करोड़ो के शोरूम में मिलता है और जिन फलों सब्जियों से हमारा जीवन यापन होता है व पेट भरता है वो सडको के किनारे फूट पाथ पर मिलती है जूते बेचने वाला लाखो करोड़ो का मालिक होता है और सब्जी बेचने वाले को अपना जीवन यापन करना तक मुश्किल हो रहा है आज हमारी प्रचानी संस्कृति को विदेशो में लोग अपना कर रहे है। और हमारे देश मे पाश्चात्य सभ्यता का दिन प्रतिदिन चलन बढ रहा है
जो आने वाले समय के लिए अच्छे संकेत नही है । हमे सनातन धर्म की रक्षा व अपनी प्राचीन संस्कृति व परंपराओ को संरक्षित करना होगा । उन्होंने कहां कि हमारे सनातन धर्म में गाय को गौ माता कहा गया है और इसकी सेवा करना हम सभी का नैतिक कर्तव्य है मगर आज हम गौ सेवा तो क्या हम तो गौ माता को सड़कों पर बेसहारा छोड़ रहे हैं । जो आने वाले समय में हमारे विनाश का कारण बन सकता है । कृष्ण कांत ने कहा कि इस भागवत कथा में बताई गई बातो का अपने जीवन में अनुसरण करना होगा । ऐसे धार्मिक अनुष्ठान का असली उद्देश्य पूरा हो सकेगा ।

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