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पर्वतों के शिखर पर दीप रखते हो ।

पर्वतों के शिखर पर दीप रखते हो।
अपने आप में ये हुनर रखते हो।।
शिखर तक पहुंचने का जज़्बा कैसे मिला।
क्या हौसलों को तुम अपने घर रखते हो।।
उन्हें भी साथ ले लो जो हाथ बढ़ाए हैं।
अगर अपने आप में ये जिगर रखते हो।।
राह कठीन है ये सब जानते हैं।
तो क्यों रास्ते मे तुम, घर रखते हो।।
शिखर के राह पे चलते रहना तुम।
अगर अपना हौसला बुलंद रखते हो ।।
कभी यादों के परछाइयों में गर घिरा करो।
तो ये कहना की मजबूरियों को घर रखते हो ।
पहुंच कर वहां तुम इतराना नहीं।
अगर विनम्रता अपने पास रखते हो।।

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