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स्कूल प्रवेश के समय किताबों और कॉपियों का बढ़ता खर्च: नियंत्रण की सख्त ज़रूरत

गुजरात, 3 जून 2025:

हर साल जब स्कूलों में प्रवेश प्रक्रिया शुरू होती है, तो अभिभावकों के सामने सबसे बड़ी चिंता बनकर उभरती है—किताबों और कॉपियों का बढ़ता खर्च। विशेष रूप से निजी स्कूलों में यह समस्या और भी गंभीर हो जाती है, जहाँ बच्चों को विशेष दुकानों से महंगी किताबें और स्टेशनरी खरीदने के लिए मजबूर किया जाता है।

किस पर है नियंत्रण?

अभिभावकों का कहना है कि किताबों की कीमतें तय करने का कोई स्पष्ट नियम नहीं है। स्कूल प्रशासन कभी-कभी विशेष प्रकाशकों से समझौता करके किताबें बेचते हैं, जिससे कीमतें आसमान छूने लगती हैं। स्थिति यहाँ तक पहुँच चुकी है कि कई बार एक बच्चे की किताबों और कॉपियों का खर्च ₹5,000 से ₹10,000 तक हो जाता है।

क्यों नहीं है कोई नियंत्रण व्यवस्था?

सरकारी नियमों के बावजूद ज़मीनी स्तर पर इन पर अमल नहीं हो रहा है। न तो राज्य शिक्षा बोर्ड और न ही स्थानीय प्रशासन इस मुद्दे पर कोई सख़्त कदम उठा रहे हैं। शिक्षा अधिकार अधिनियम (RTE) के तहत शिक्षा को सुलभ और सस्ती बनाना आवश्यक है, लेकिन निजी स्कूलों की मनमानी इसके खिलाफ जाती है।

समाधान की ज़रूरत: एक पारदर्शी व्यवस्था

शिक्षा विशेषज्ञों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि अब वक्त आ गया है जब इस समस्या पर ठोस और प्रभावी नीति लाई जाए:

सरकारी स्तर पर किताबों की कीमतों को नियंत्रित करने वाला निकाय बनाया जाए।

सभी स्कूलों को किताबों की सूची सार्वजनिक करनी होगी और किसी विशेष दुकान या प्रकाशक से खरीदने की बाध्यता समाप्त हो।

राज्य सरकारें स्कूलों की ओर से निर्धारित पुस्तक सूचियों की नियमित जांच करें।

स्थानीय जिलाधिकारियों और शिक्षा अधिकारियों को शिकायत निवारण का अधिकार दिया जाए।

निष्कर्ष:
बच्चों की शिक्षा एक मौलिक अधिकार है, न कि व्यापार का साधन। यदि इस मुद्दे पर जल्द कदम नहीं उठाए गए, तो यह आने वाले समय में शिक्षा को एक महँगी और असमान व्यवस्था बना देगा। आवश्यक है कि समाज और सरकार मिलकर इस आर्थिक शोषण पर लगाम लगाएं और एक पारदर्शी, सुलभ शिक्षा व्यवस्था की ओर कदम बढ़ाएं।

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