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जातिगत जनगणना: आत्मसंघर्ष करता भारतीय लोकतंत्र

“जाति न पूछो साधु की...” — कबीर का यह वचन भारतीय चेतना को उस समय झकझोरता है जब जातिगत पहचान, सामाजिक न्याय और अधिकार के बीच खींची जाने वाली रेखाएँ और गहरी होती जा रही हैं।

21वीं सदी के भारत में जहाँ विज्ञान और तकनीक की तेज़ रफ्तार से देश आर्थिक ऊँचाइयों को छू रहा है, वहीं सामाजिक चेतना की ज़मीन पर आज भी जाति, धर्म और संप्रदाय की दरारें वैसी की वैसी हैं — कहीं-कहीं और गहरी होती हुई।

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा उठाया गया जातिगत जनगणना का प्रश्न केवल एक राजनीतिक चाल नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र में छिपे सामाजिक अंतर्विरोधों के लिए आँकड़ों की स्पष्टता की मांग है — एक ऐसी माँग जो संविधान में निहित समानता के वादे को नीतिगत स्तर पर लागू करने की दिशा में जाती है।

राजनीति: सत्ता का संतुलन या वोट-बैंक की गणित?

जातिगत जनगणना को लेकर राजनीतिक वर्ग दो हिस्सों में बँटा हुआ है। एक पक्ष इसे वंचित समुदायों की भागीदारी सुनिश्चित करने वाला लोकतांत्रिक उपाय मानता है, तो दूसरा पक्ष इसे सामाजिक ध्रुवीकरण का माध्यम बताता है। लेकिन दोनों ही दृष्टिकोणों के मूल में एक सत्य छिपा है — भारत में ‘राजनीतिक गणना’ अक्सर ‘सामाजिक गणना’ से पहले की जाती रही है।

मंडल आयोग की सिफारिशें, OBC की स्पष्ट गणना का अभाव, और आरक्षण नीति की जमीनी विसंगतियाँ इस बात का संकेत हैं कि नीति निर्धारण में डेटा का अभाव न केवल समाज के एक वर्ग को अदृश्य बना देता है, बल्कि नीतियों को भी अस्पष्ट और पक्षपातपूर्ण बना देता है।

सामाजिक विमर्श: पहचान या पुनर्पाठ?

जाति, भारतीय समाज का सबसे पुराना और सबसे जटिल सामाजिक ढाँचा है। शास्त्रीय वर्ण व्यवस्था से शुरू हुई यह संरचना आज सामाजिक शोषण और अवसरों की विषमता का स्थायी कारण बन चुकी है। आज भी दलितों, आदिवासियों और पिछड़े वर्गों को कई मौलिक अधिकारों की प्राप्ति में अवरोधों का सामना करना पड़ता है।

जातिगत जनगणना इस व्यवस्था का एक सामाजिक एक्स-रे हो सकती है — जिससे यह पता चल सके कि कौन-सा वर्ग कहाँ खड़ा है, और किन क्षेत्रों में अभी भी पिछड़ा हुआ है। डेटा के बिना न्याय सिर्फ आदर्श है, उसके पास संख्या नहीं, संरचना नहीं, और समाधान की दिशा नहीं।

संविधान और समानता: आँकड़ों का न्यायशास्त्र

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15, 16 और 340 समानता, अवसर और सामाजिक न्याय को सुनिश्चित करने की बात करते हैं। परंतु 1931 के बाद से आज तक कोई आधिकारिक जातिगत जनगणना नहीं हुई।

यह एक गहरी विडंबना है कि जिस राष्ट्र की नीतियों का आधार समानता है, वह अपनी सामाजिक संरचना के सबसे बुनियादी आंकड़े तक नहीं रखता।

क्या हम 'समानता' की बात सिर्फ अनुमान के आधार पर करेंगे, या उसे आँकड़ों के ज़रिए प्रमाणिक और पारदर्शी बनाएँगे?

नैतिक विमर्श: कबीर का भारत या आँकड़ों से डरा भारत?

जातिगत जनगणना के विरोध में यह तर्क अक्सर दिया जाता है कि इससे जातिवाद और बढ़ेगा। यह एक सुविधाजनक वैचारिक भ्रम है। सच्चाई यह है कि जाति पहले से ही हमारे विवाह, राजनीति, शिक्षा, और सामाजिक व्यवहार का आधार बनी हुई है — चाहे हम माने या न माने।

जाति का उल्लेख जातिवाद फैलाने के लिए नहीं, बल्कि उस अदृश्य विषमता को पहचानने के लिए आवश्यक है जो समाज में गहराई से समाई हुई है। जब तक हम जातिगत आंकड़ों का सामना नहीं करते, हम कबीर की उस कल्पना में प्रवेश नहीं कर सकते जहाँ जाति गौण और गुण प्रमुख होता है।

आँकड़े विभाजन नहीं करते, वे विवेक जगाते हैं:

जातिगत जनगणना न तो समाज को तोड़ने का औज़ार है, न कोई चुनावी पैंतरा। यह भारत के लोकतंत्र को नीति-निर्धारण में पारदर्शी, न्यायसंगत और ज़िम्मेदार बनाने का प्रयास है।

जब तक हम उन वर्गों को, जिन्हें भारतीय संविधान ने बराबरी का वादा किया था, मूल्यांकन और मान्यता दोनों से वंचित रखते हैं, तब तक विकास अधूरा है।

जाति पूछना एक राजनीतिक साजिश नहीं — बल्कि एक सामाजिक आवश्यकता है, जब तक कि हम उस दिन तक न पहुँचें जहाँ वाकई कोई जाति पूछने वाला न रहे।

“जाति के आँकड़े नहीं बाँटते — वे जोड़ते हैं, अगर उद्देश्य न्याय हो।”

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