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मुद्दों की राजनीति: इमोशन्स का खेल या जनसेवा का सच?

मोदी गॉवमेंट की एक समझ में नहीं आ रही है जब भी इलेक्शन आती है देश में कोई न कोई मुद्दा आ जाता है |ऐसा अलग रहा है मुद्दा सोच समझ कर बनाया गया है | चाहे एंड-पाक वॉर हो या अब कोविद क्यकि बिहार इलेक्शन है इसका डिरेक्ट फायदा इलेक्शन में होने वाला है आखिर माशूम लोगो के साथ अत्याचार कब तक होगा | अब तू कुछ यूटूबेर मोदी जी को भागवन कल्कि से जोर कर देख रहे है | अरे यार भागवन और मनुष्य में कुछ तू फर्क रहने दो,क्या जरुरत है किसी अँधा सपोर्ट करने के लिए | भागवन खुद बोलते है अपना तर्क शक्ति का उसे करना चाहिए,हम इंडियन धर्म और नॅशनलिटी के नाम पर इमोशन हो जाते है लेकिन इसका फायदा कोई गलत तरीके से उठए ये गलत बात है | क्यों राजदंड भारत की निशानी है देश के प्रधान मंत्री के हाथ में देना एक प्रथा है चाहे मोदी जी हो या कोई और वो उसको मिलता है |
कभी देश के नाम पर कभी धर्म के नाम पर तू कभी सेना के नाम पर मोदी गोवेम्नेट कितना ब्लैकमेल करेगी,अब तू बैठे बीतए एक और मुद्दा बन गया कोविद का इसका फायदा सीधा इलेक्शन में हो गया | इसको कहते है अश्ली लोटी,पूरा खाना परोस कर के सामने रख देना | अगर इस गोवेर्मेंट से हिसाब माँगा जाये तू आने क्या काम किया है इतने दिनों में बस कुछ लोग 1947 से हिसाब देंगे ये इनको समझ में नहीं आ रहा है इस बात मुझे कवी कुमार विश्वास जी ने कहा था जो गलती हमारे पूर्वज से हुई थी वो हम लोगो को सीखेना चाहिए और आगे बढ़ना चाहिए लेकिन हमारी मोदी गोवेर्मेंट सिर्फ पीछे देखती है

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