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तय हो कोरोना योद्धा कौन, बंद हो लाॅकडाउन में पैसा कमाने वालों का महिमामंडन

मेरठ। मार्च 2020 में पूरे शबाब पर आई कोरोना महामारी से आम आदमी को बचाने के लिए व्यापारी हो या पत्रकार मजदूर हो या उद्योगपति, समाजसेवी हो या राजनेता सबने लोगों की सेवा की और उनके साथ कंधा से कंधा मिलाकर खड़े रहे। लेकिन ग्रामीण कहावत जिसकी लाठी उसकी भैंस के समान    कोरोना योद्धा उन कुछ लोगों को माना गया जो पहले से ही सरकारी सेवा में चाहे वह चिकित्सक हो या पुलिस या अन्य विभाग में कार्यरत थे और उन्हें अच्छी खासी तनख्वाह मिल रही थी उन्हंे कोरोना योद्धा माना गया और मुजावजे के साथ साथ परिवार को सुरक्षा भी मिली।

इसमें अगर देखें तो कुछ बुराई भी  नहीं थी क्योंकि वो भी हमारे परिवार  के सदस्य थे। किसी का पति तो किसी का भाई और बेटा बेटी नौकरी में है। लेकिन एक कसक यह रही कि इस क्षेत्र में दिन रात काम करने वालों वर्गांे को इस श्रेणी में शामिल नहीं किया गया जबकि उनका  काम बिना किसी स्वार्थ के था। ऐसे लोगों में वो समाजसेवी जो पुलिस और प्रशासन के साथ कंधे से कंधा मिलाकर हर समय काम रहे थे कि कोरोना का असर कम हो और कोई भी पीड़ित जान से हाथ ना धो बैठे। यही हाल मीडिया से जुड़े लोगों का रहा। 16-16 घंटे इन लोगों ने काम किया और इन्हें कोरोना योद्धाओं की सुविधा तो दूर वैक्सीन लगाने में प्राथमिकता से भी शामिल नहीं किया गया। अब सरकार ने उनके इंश्योरेंस कवर को आगे नहीं बढ़ाने का फैसला किया है। इस योजना के तहत हेल्थ वर्कर्स की मौत होने पर परिजनों को अब तक 50 लाख रुपये तक का बीमा कवर मिलता है।

इस योजना की शुरुआत मार्च 2020 में हुई थी। इसका उद्देश्य कोरोना हेल्थ वर्कर्स को सुरक्षा मुहैया कराना है जिससे कोरोना वाॅरियर्स की मौत होने पर उनके परिवार की देखभाल हो सके। मगर सरकार ने यह फैसला ऐसे वक्त किया है जब देश में कोरोना की दूसरी लहर चल रही है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने पिछले महीने राज्यों को भेजे सर्कुलर में कहा था कि यह योजना 24 मार्च को खत्म हो जाएगी। इसके तहत तब तक केवल 287 दावों का निपटारा किया गया था। इस योजना के तहत करीब 22 लाख स्वास्थ्यकर्मियों को विशेष बीमा कवर उपलब्ध कराया जा रहा है।


यह बीमा सुविधा केंद्र और राज्य सरकारों के तहत आने वाले अस्पतालों में काम करने वाले चिकित्सकों, नर्सों, चिकित्सा सहायकों, साफ-सफाई कर्मियों तथा कुछ अन्य लोगों को उपलब्ध कराई जा रही है। इस योजना की घोषणा करते हुए वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा था कि सफाई कर्मियों, वार्ड ब्वाॅयज, नर्सों, आशा कर्मियों, सहायकों, चिकित्सकों तथा विशेषज्ञों और अन्य स्वास्थ्य कर्मियों को इस विशेष बीमा सुविधा का लाभ मिलेगा। प्राइवेट सेक्टर के हेल्थ वर्कर्स को भी इस योजना में शामिल किया गया था।
 इस बात का कोई आधिकारिक डेटा नहीं है कि देश में कोविड-19 के कारण कितने फ्रंटलाइन वर्कर्स की मौत हुई लेकिन देश में डाॅक्टरों की सबसे बड़ी संस्था इंडियन मेडिकल एसोसिएशन की     मुताबिक कोरोना संक्रमण के कारण अब तक देश में कम से कम 739 एमबीबीएस डाॅक्टरों की मौत हो चुकी है।

एक साल के लिए बढ़ाई गई थी योजना
केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव राजेश भूषण ने 24 मार्च को राज्यों को लिखे पत्र में कहा कि इस योजना काफी कारगर रही और इसने कोविड-19 के कारण जान गंवाने वाले हेल्थवर्कर्स के परिवारों को काफी राहत दी। भूषण ने लिखा कि 24 मार्च की आधी रात तक के सभी क्लैम इस योजना के तहत स्वीकार्य होंगे और सभी मान्य दावों को सौंपने के लिए एक महीने का समय दिया जाएगा। सीतारमण ने पिछले साल 26 मार्च को इस योजना की घोषणा की थी और पहले इसकी अवधि 90 दिन थी जिसे बाद में बढ़ाकर एक साल कर दिया गया था।

डाॅक्टरों ने योजना को आगे नहीं बढ़ाने के केंद्र के फैसले पर रोष जताया है। आईएमए के अध्यक्ष रवि वानखेडकर ने कहा कि यह दुखद फैसला है और सरकार की संवेदनहीनता को दिखाता है। सरकार ने यह फैसला ऐसे समय किया है जब हेल्थकेयर वर्कर्स कम संसाधनों में लोगों की जान बचाने में जुटे हैं। इस दौरान उन्हें कई तरह की शारीरिक और मानसिक परेशानियों से गुजरना पड़ रहा है। अब यह योजना खबर के अनुसार 24 अप्रैल तक लागू है। 90 दिन के स्थान पर एक साल में तीन बार इसकी अवधि बढ़ाई गई। 287 लोगों को इस योजना का लाभ दिया जा चुका है लेकिन आईएमए का कहना है कि 787 स्वास्थ्यकर्मी की मौत संक्रमण से हुई जिनमें से 50 फीसदी को भी सहायता नहीं दी गई। 

मैं आईएमए के लोगों के कथन पर तो कुछ नहीं कहना चाहता लेकिन यह किसी से छिपा नहीं है कि कुछ चिकित्सकों ने किस प्रकार से कोरोना काल में पैसा कमाया है। और नर्सिंग होम संचालकों के बारे में लोग क्या राय रखते हैं। खुद मैं कई डाॅक्टरों को जानता हूं जिन्होंने डेढ से दो गुना फीस की और मरीजों के साथ कितना गंदा व्यवहार इनके द्वारा किया जाता था यह किसी को बताने की जरूरत नहीं है। मजबूर व्यक्ति का लाभ इन्होंने उठाया इसलिए अपने सहयोगियों को सहायता और मुआवजा भी इन्हें ही देना चाहिए सरकार क्यों दें। अभी कल की ही बात है कि यूपी के मेरठ में गंगानगर निवासी रमन चैधरी यहां स्थित संगीता नर्सिंग होम में अपनी पत्नी संगीता चैधरी को दिखाने गए तो उनसे तीन गुना फीस मांगी गई। यह खबर अखबारों में खूब छपी हैं और उसकी एफआईआर भी शायद उन्होंने कराई है। 

यह तथ्य इस बात का सुबुत है कि समय और मजबूरी का फायदा कुछ डाॅक्टरों ने कैसे उठाया। सरकार कह रही है कि अभी इस योजना को दूसरे नाम से चलाया जाएगा। हमेें इससे कोई ऐतराज नहीं है लेकिन पीएम मोदी से एक  मांग है कि ऐसी योजना दोबारा शुरू की जाती है तो उसमें अपने आप को कोरोना योद्धा कहलाने वालों से पहले उन समाजसेवियों, पत्रकारों और व्यापारियों तथा असंगठित क्षेत्र के मजदूरों को शामिल किया जाए क्योंकि किसी ना किसी रूप में इन सबका योगदान निस्वार्थ रूप से बड़ा था। भरपूर काम करने के बाद भी प्रताड़ना और अवहेलना के अलावा कुछ नहीं मिला। इसलिए अब अगर कोई भी योजना शुरू की जाए तो उन सभी लोगों को इसमें शामिल किया जाए जो पात्र हैं। और यह भी तय हो कि वाकई में कोरोना योद्धा कौन है।

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