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**✦ नव-नियुक्त वक्फ समिति (22 से 28 मसूरी) के अध्यक्ष शिमून अहमद और कोषाध्यक्ष मोहम्मद जुबेद से खास बातचीत ✦**

“वक्फ एक जिम्मेदारी नहीं, इबादत है – इसे निभाना हर मुसलमान का फर्ज़ है”

मसूरी की वक्फ समिति (22 से 28) के नवनियुक्त अध्यक्ष शिमून अहमद साहब और कोषाध्यक्ष मोहम्मद जुबेद साहब से एक विशेष इस्लामी मुलाक़ात के दौरान महत्वपूर्ण विचार सामने आए।

सबसे पहले, वक्फ बोर्ड उत्तराखंड द्वारा अध्यक्ष शिमून अहमद को दी गई इस महत्वपूर्ण जिम्मेदारी पर उन्हें मुबारकबाद दी गई। उन्होंने बातचीत में कहा,
यह ज़िम्मेदारी मेरे लिए सिर्फ एक ओहदा नहीं, बल्कि अल्लाह तआला की तरफ़ से दी गई एक अमानत है, जिसका मैं पूरी ईमानदारी और निष्ठा से निर्वहन करूंगा।

उन्होंने आगे कहा,
वक्फ एक बहुत बड़ी नेमत है, जो अल्लाह के रास्ते में की जाती है। यह एक फी-सबीलिल्लाह अमल है, जिसे सिर्फ दिल से निभाया जा सकता है। हर मुसलमान का यह दायित्व है कि वह इस नेक काम में भागीदारी करे।

अध्यक्ष साहब ने अपनी समिति के सभी पदाधिकारियों को भी तालीम दी कि
अपने काम को ईमानदारी, इंसाफ़ और अल्लाह के डर के साथ अंजाम दें। यह ओहदा एक इम्तिहान भी है और एक मौका भी, जिससे समाज की खिदमत की जा सकती है।

कोषाध्यक्ष मोहम्मद जुबेद साहब ने बातचीत में वक्फ की हकीकत को बयान करते हुए कहा:
वक्फ कोई नाम नहीं, बल्कि एक इस्लामी अमल है। अगर कोई व्यक्ति वक्फ की जिम्मेदारी को सही तरीके से अंजाम नहीं देता, तो कुरआन व हदीस में साफ़ लिखा है कि वह अल्लाह के सामने जवाबदेह होगा।

उन्होंने वक्फ की परिभाषा को इस अंदाज़ में समझाया:
वक्फ का मतलब है – किसी माल, जायदाद या चीज़ को अल्लाह की राह में हमेशा के लिए वक्फ कर देना, ताकि उसका फायदा मस्जिदों, मदरसों, यतीमों, गरीबों और दीनी कामों में हो। यह माल फिर किसी इंसान की निजी मिल्कियत नहीं रहती, बल्कि वह अल्लाह की अमानत बन जाती है।

साथ ही कोषाध्यक्ष मोहम्मद जुबेद साहब ने यह भी कहा:
मैं अध्यक्ष साहब की अगुवाई में, समिति के सभी पदाधिकारियों के साथ मिलकर पूरी ईमानदारी और हक़ पर कायम रहकर काम करूंगा। यह सिर्फ एक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि मेरे लिए अल्लाह को जवाब देने का मामला है। इसलिए मैं अपनी जिम्मेदारी को एक इबादत समझकर निभाऊंगा।

अंत में उन्होंने समाज से गुज़ारिश की कि
वक्फ का काम सिर्फ किसी एक इंसान का नहीं, बल्कि पूरी उम्मत की जिम्मेदारी है। आज भले हम नई चीज़ वक्फ न कर सकें, लेकिन जो वक्फ पहले से मौजूद है, उसका हिफाज़त करना हमारा फर्ज़ है।

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