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फिल्मों में कब तक पिटते रहेगें वकील, डाक्टर, पत्रकार, समाजसेवी और महिलाएं

ओटीटी प्लेटफार्म सोशल मीडिया पर अनुशासन बनाए रखने और किसी की भावनाओं को ठेस ना पहुंचे ऐसी खबरों का प्रचलन रोकने हेतु केंद्र सरकार नए नियम और कानून बना रही है। पूर्व में फिल्मों में प्रतिबंधित, उत्तेजना और वैमन्सयता फैलाने वाले दृश्यों का प्रचलन रोकने के लिए फिल्म सेंसर बोर्ड बना हुआ है और मीडिया पर अंकुश लगाने की कोशिश भी गाहे बगाहे घुमा फिराकर या सीधे सीधे सरकारें और विभिन्न विभागों के अधिकारी आए दिन करते ही रहते हैं। लेकिन सार्वजनिक रूप से समाज के प्रतिष्ठित और नागरिक वर्ग आदि के फिल्मों में दिखाए जाने वाले अपमान की ओर अभी तक किसी का ध्यान क्यों नहीं गया यह तो प्रसार भारती बोर्ड दूरदर्शन फिल्म सेंसर बोर्ड और सूचना प्रसारण मंत्रालय के साथ ही गृह और कानून विभाग के अफसर ही जान सकते हैं कि इस ओर अभी तक इनका ध्यान क्यों नहीं गया यह एक ताज्जुब का विषय है।
इस बात से कोई भी अनभिज्ञ नहीं है कि जो फिल्में हम देखते हैंे चाहे वह दक्षिण भारतीय हो या बिहारी या हाॅलीवुड से संबंध उनमें किस प्रकार से पत्रकारों, वकीलों, डाॅक्टरों, महिलाओं, पुलिस, और प्रशासनिक अधिकारियों के साथ साथ समाजसेवी और धार्मिक क्षेत्रों से जुड़े लोगों के साथ मारपीट और गाली गलौच तथा उनके अपमान के दृश्य दिखाने के साथ ही महिलाओं के साथ जो दरिंदगी दिखाई जाती है कभी कभी तो वह इतनी सीमा लांघ जाती है कि रूह कांपने लगती है।


सवाल यह उठता है कि वकील का पेशा हो या पत्रकार, डाॅक्टर हो या अफसर जो जिस क्षेत्र में सक्रिय है उसका वहां के साथ साथ समस्त समाज में अपना एक मान सम्मान होता है। लेकिन फिल्मों में खासकर दक्षिण भारतीय सिनेमा द्वारा जिस प्रकार से विलेन इन वर्गों के लोगों पर हमला करता है या इनसे संबंध लोगों की जो भूमिका दिखाई जाती है उससे सार्वजनिक जीवन में समाज के इन प्रमुख वर्गो और महिलाओं की छवि तो धूमिल हो ही रही है असामाजिक तत्वों आदि के हौंसले भी बढ़ने लगे है।

अनेको मौकों पर देखने को मिलत है कि फलां व्यक्ति ने अपनी इच्छापूर्ति न होने के चलते इन वर्गों से संबंध लोगों पर सार्वजनिक रूप से हमला कर उन्हें पीटा और महिलाओं से दुव्यर्वहार और अपमान किया गया। मुझे लगता है कि कहीं न कहीं रेप की जो घटनाएं बढ़ रही है उनके लिए ऐसी ही फिल्मंे भी दोषी है क्योंकि इनमें जो गैंगरेप, छेड़छाड़ और मारपीट की घटनाएं अंजाम दी जाती और उन्हें अंजाम देने वालों का कुछ ना बिगड़ना आदि ऐसी मनोवृति को बढ़ावा दे रहे हैं।
- रवि कुमार विश्नोई
सम्पादक – दैनिक केसर खुशबू टाईम्स
अध्यक्ष – ऑल इंडिया न्यूज पेपर्स एसोसिएशन
आईना, सोशल मीडिया एसोसिएशन (एसएमए)
MD – www.tazzakhabar.com



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