logo
(Trust Registration No. 393)
Write Your Expression

झूठे मामलों में जेल भेजने और जिंदा को मुर्दा बताने वालों के खिलाफ भी हो सख्त से सख्त कार्रवाई

प्रशासन व पुलिस अधिकारियों के सहित अन्य विभागों के अफसरों आदि के समक्ष उपस्थित होकर यह कहते काफी लोग सुने जाते हैं कि हुजुर मैं जिंदा हूं आपसी चुस्तबंदी या जमीन हड़पने के लिए मुझे मरा हुआ दिखा दिया गया। इससे संबंधित खबरें भी ख्ूाब सुनने पढ़ने को मिलती है। एक फिल्म भी इस पर शायद बनी है। ऐसा क्यों हो रहा है। यह किसी को बताने की आवश्यकता नहीं है जो पुलिस की कार्यप्रणाली जानते हैं वो समझते हैं कि डंडे के दम पर इनमें से कुछ कब क्या कर गुजरे यह कोई सोच भी नहीं सकता। 1999 में दुष्कर्म के आरोप में जेल भेजे गए विष्णु तिवारी प्रकरण को देखा जा सकता है। जिसमें अब राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने विष्णु तिवारी के 19 वर्ष से अधिक समय जेल में गुजारने को बेहद गंभीरता से लिया है। एनएचआरसी ने उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव और डीजीपी को नोटिस जारी कर दुष्कर्म के आरोप में दोषी ठहराए जाने के 19 बरस बाद विष्णु के बरी होने के मामले में विस्तृत रिपोर्ट तलब की है।


एनएचआरसी ने खासकर जिम्मेदार लोक सेवकों के विरुद्ध की गई कार्रवाई तथा पीड़ित विष्णु को राहत पहुंचाने व उनके पुनर्वास के लिए उठाए गए कदमों की रिपोर्ट भी तलब की है। और इसके लिए छह सप्ताह का समय दिया है। एनएचआरसी ने सेंटेंस रिव्यू बोर्ड (सजा समीक्षा बोर्ड) की कार्यशैली पर भी सवाल उठाया है और कहा है कि बोर्ड निष्प्रभावी होकर रह गया है। कई ऐसे मामले भी सामने आते हैं, जिनमें 75 वर्ष से अधिक आयु के बंदियों की जेल में ही मौत हो जाती है।

बता दें कि एनएचआरसी ने मीडिया रिपोर्ट के जरिए इस गंभीर मामले का संज्ञान लिया है। कहा गया है कि 23 वर्षीय व्यक्ति को दुष्कर्म के मामले में ट्रायल कोर्ट ने उम्र कैद की सजा सुनाई थी। उसे करीब 19 वर्ष बाद इलाहाबाद हाई कोर्ट ने निर्दोष करार दिया। इस अवधि के दौरान, उसके परिवार के कई सदस्यों की मृत्यु हो गई थी। जेल में उसका आचरण हमेशा अच्छा पाया गया, लेकिन पिता के अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए भी पैरोल नहीं मिला। भाई के अंतिम संस्कार में भी शामिल होने की अनुमति नहीं दी गई। पीड़ित विष्णु तिवारी पर वर्ष 1999 में अनुसूचित जाति की एक महिला के साथ दुष्कर्म का संगीन आरोप लगाया गया था। ललितपुर जिले की निचली अदालत ने मामले की सुनवाई के दौरान विष्णु को दोषी ठहराया था। वर्ष 2005 में विष्णु ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था और करीब 14 वर्ष बाद इंसाफ मिला।


इसी प्रकार से हत्या के एक झूठे केस में 14 साल की सजा काट चुके व्यक्ति के मामले को देखा जा सकता है जो इस प्रकार है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हत्या के आरोप में आजीवन कारावास की सजा भुगत रहे कैदी को लगभग 14 साल जेल में बिताने के बाद बरी कर दिया है। कोर्ट ने दो अन्य आरोपियों को भी बरी कर दिया है। ये पहले से जमानत पर थे। कोर्ट ने कहा कि घटना के समय चश्मदीद गवाहों की मौजूदगी संदेहास्पद है।

अभियोजन पक्ष आरोप को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा है। साथ ही सत्र न्यायालय ने साक्ष्यों को समझने में गलती की है। यह निर्णय न्यायमूर्ति मनोज मिश्र तथा न्यायमूर्ति एसके पचैरी की खंडपीठ ने मुकेश तिवारी, इंद्रजीत मिश्र व संजीत मिश्र की आपराधिक अपील को स्वीकार करते हुए दिया है।
अभियोजन पक्ष का कहना था कि प्रताप शंकर मिश्र व उनकी पत्नी मनोरमा देवी घर पर कमरे में सोये थे। दो भाई बरामदे में सोये थे। पत्नी मनोरमा देवी ने कहा कि आरोपी हाकी, चाकू व पिस्टल लेकर आए और हमला कर दिया। कोर्ट ने कहा कि मेडिकल रिपोर्ट में शरीर पर हाॅकी की चोट के निशान नहीं हैं। गोली गले में लगी है। पत्नी सहित अन्य चश्मदीद के कपड़ों पर खून नहीं है।

हमलावर शोर सुनकर बाउंड्री कूदकर भाग गए। किसी ने पकड़ने की कोशिश नहीं की और उन्हें बाउंड्री कूदकर भागते भी किसी ने नहीं देखा। इससे लगता है कि चश्मदीद गवाह घटना के बाद वहां पहुंचे। घायल को गाड़ी से रेवती थाने ले गए। मजरूबी चिट्ठी लिखी गई। मजरूबी चिट्ठी कब किसने लिखी, यह स्पष्ट नहीं। केवल साथ गए चश्मदीद के हस्ताक्षर सही पाए गए। फिर घायल को बलिया सदर अस्पताल ले गए, जहां उसे मृत घोषित कर दिया गया।
पत्नी के अलावा अन्य चश्मदीद गवाहों को कोर्ट में पेश ही नहीं किया गया। आरोपियों से दुश्मनी के कारण चार्जशीट दाखिल की गई लेकिन फायर करने के आरोपी मुकेश का कोई संबंध ही नहीं था। वह मृतक की दूसरे को बेची गई जमीन खरीदार से खरीदना चाहता था। उसका कोई झगड़ा भी नहीं था। कोर्ट ने कहा कि प्राथमिकी देरी से दर्ज हुई। जबकि पीड़ित दो बार थाने गए, अस्पताल जाते समय व अस्पताल से लौटते समय वे एफआईआर दर्ज करा सकते थे। इसके अलावा मजरूबी चिट्ठी लिखे जाने का दिन व समय स्पष्ट नहीं है। बयान भी विरोधाभाषी है। आरोपियों के खिलाफ ठोस सबूत नहीं है। हत्या की काल्पनिक कहानी गढ़ी गई।
कोर्ट ने कहा कि घटना की कई संभावनाएं दिखाई दे रही हैं। हो सकता है मृतक प्रताप शंकर मिश्र बरामदे में चारपाई पर सोए हों और घायल होने पर कमरे की तरफ भागे हों तथा कमरे में खून गिरा हो। दोनों भाई आंगन के बरामदे में सोए थे या सहन के बरामदे में, स्पष्ट नहीं है। हो सकता है, वे बाद में आए हों। पत्नी व भाई के कपड़े पर खून न होने से लगता है चश्मदीदों ने घायल को छुआ तक नहीं। विचारण न्यायालय ने इन बिंदुओं पर विचार ही नहीं किया और सजा सुना दी। कोर्ट ने सत्र न्यायालय की सजा रद्द कर दी है और आरोपियों को बरी करने का निर्देश दिया है।
ऐसे मामलों को लेकर आज कुछ लोगों द्वारा की जाने वाली चर्चा कि पुलिस मामले को रफा दफा करने या दबाने अथवा बढ़ रहे दबाव को समाप्त करने एवं अन्य और कारणों से कितने ही मामलों में पूर्ण रूप से जागरूकता के साथ तहकीकात नहीं करती है। इसलिए बेगुनाह लोग या तो गुमनाम जिंदगी जीने के लिए मजबूर होते हैं या जेलों में सजा काटते हैं। अगर जानकारी की जाए तो विष्णु तिवारी और मुकेश आदि जैसे सैंकड़ों मामले खुलकर सामने आ सकते हैं। सवाल यह उठता है कि विभिन्न मामलों में सरकारी अधिकारियों द्वारा जिन लोगों को मरा हुआ दिखाया जाता है या जेल भिजवा दिया जाता है उनके जो जीवन के बहुमूल्य वर्ष और धन खर्च होता है और मानसिक उत्पीड़न जो हुआ क्या उसकी भरपाई हो सकती है। मुझे लगता है कि ऐसा संभव नहीं है। क्योंकि जो समय गुजर गया वो वापस नहीं आ सकता। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का यह सवाल की लोकसेवक बताएं 19 वर्ष जेल में क्यों रहा बेगुनाह अपने आप में यह दर्शाता है कि अफसर इन कारणों के लिए जिम्मेदार है और उनको सजा मिलनी ही चाहिए जिससे भविष्य में किन्ही और बेगुनाहों को इनके द्वारा झूठे मामलों में फंसाकर मानसिक और आर्थिक तथा सामाजिक रूप से बर्बाद करने की हिम्मत ना हो।

– रवि कुमार विश्नोई
सम्पादक – दैनिक केसर खुशबू टाईम्स
अध्यक्ष – ऑल इंडिया न्यूज पेपर्स एसोसिएशन
आईना, सोशल मीडिया एसोसिएशन (एसएमए)
MD – www.tazzakhabar.com


13
8365 Views
59 Shares
  • Pawan Sharma

    आज भी हजारों निर्दोष जेल में सजा काट रहे होंगे।

13
8850 Views
0 Shares
Comment
13
8308 Views
1 Shares
Comment
13
9218 Views
1 Shares
Comment
13
8422 Views
1 Shares
Comment
13
8711 Views
1 Shares
Comment