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हम मुसलसल ही सफर करते रहे मंजिल तक, गर्दिशों तुमने कभी हमको ठहरने न दिया. ...

मेरी चाहत ने तेरी याद को मरने न दिया, इसलिए मैंने तिरे जख्म को भरने न दिया, लाख दुश्मन हैं मगर मुझसे मिलेगा इक दिन, मैंने इस ख्वाब को आंखो से बिखरने न दिया, चंद लम्हों की खुशी खूब उन्हें ले डूबी,और इक हम हैं, जिसे गम ने उभरने न दिया,हम मुसलसल ही सफर करते रहे मंजिल तक, गर्दिशों तुमने कभी हमको ठहरने न दिया, आग सीने में जलाई है चरागों के लिए, पास से यूं ही हवाओं को गुजरने न दिया, इक तो मुश्किल भी था खामोश मेरा रहना भी,उस पे हालात ने भी मुझको संवरने न दिया, दिल के अरमान हमें तंग बहुत करते हैं, इसलिए दिल को मुहब्बत में उतरने न दिया । धनेन्द्र कुमार मिश्र रिपोर्टर मुंबई

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