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पर्यावरण और स्वार्थ


(लेखक: जयन्त पोरवाल)

इंसानी जीवन के लिए ऑक्सिजन प्राण वायु है। व्यक्ति बिना कुछ खाये पिये फिर भी कुछ दिन जीवित रह सकता है लेकिन वृक्षो से मिलने वाली इस प्राणवायु के बिना कुछ मिनट में ही तड़प उठता हैं। इस दौर में लोग अपने स्वार्थ के चलते वृक्ष लगातार काटते जा रहे है लेकिन उनके स्थान पर नए वृक्ष नही लगा रहे। जिससे गर्मी निरंतर अपना रौद्र रूप दिखा रही है। साल 2024 में गर्मी का पारा 50 डिग्री तक भी पहुँच गया। बहरहाल ग्रामीण इलाकों में अब भी लोग पर्यावरण के प्रति संवेदनशील है लेकिन बड़े शहरों में लोग ऐ.सी. लगाने को ही इस समस्या का हल समझने लगे है जबकि वो ऐसा करके समस्या को बढ़ा रहे है। पर्यावरण की चिंता तो सभी को है लेकिन पर्यावरण के लिए चिंतन कोई नही करता। वृक्ष लगाने की बात तो सभी करते है लेकिन वृक्ष लगाकर उनका संरक्षण करना अधिक महत्वपूर्ण है। कोरोना काल मानव जीवन के लिए भले ही एक बेहद काला काल रहा लेकिन लोकडाउन की वजह से पर्यावरण के लिये कुछ समय ही सही लेकिन स्वर्णिम बन गया था। वृक्ष लहलहाने लगे थे, नदिया स्वच्छ हो गयी थी। खैर, लोग जिस तरह धन के लालच में पेड़ों को काटकर बड़ी बड़ी इमारते बना रहे है, नदियों तालाबो पर मिट्टी डालकर समतल करके पर्यावरण को हानि पहुँचा रहे है उससे आने वाली पीढ़ी पर संकट के बादल मंडराते नजर आ रहे है। प्राकृतिक जलस्त्रोत जैसे तालाब, नदी, कुँए आदि समय के साथ या तो सूख रहे है या अतिक्रमण की भेंट चढ़ रहे है। तालाबो की पाल पे बड़ी बड़ी कॉलोनियों के कटने से प्राकृतिक जलस्त्रोत खतम होते जा रहे है। हालांकि न्यायपालिका के निर्देशानुसार इन्हें कब्जाना गैरकानूनी है लेकिन अपने स्वार्थ के चलते भूमाफिया आने वाली पीढ़ी को भयंकर जलसंकट में डालते जा रहे हैं। भूमिगत जलस्तर लगातार कम होता जा रहा है। पैसे से आप ऐ.सी. लगाकर कुछ वक्त ठंडी हवा तो ले सकते है लेकिन ऑक्सिजन के लिए पेड़ ही चाहिए। वृक्ष बरसात में जलबहाव को भी नियंत्रित करते है, वृक्षो के कटने से कई महानगरों में बरसात में बाढ़ के हालात भी बन रहे है। धन के लालच में लोग खेतो को खरीद बेचान करके इमारते बना रहे है वही दूसरी तरफ लगातार बढ़ती जनसंख्या के कारण अनाज महंगा होता जा रहा है। वृक्ष लगाना या जलस्त्रोत के संरक्षण का काम सिर्फ सरकार का नही है, ये हम सब की साझा जिम्मेदारी है। अगर वक़्त रहते इस समस्या का समाधान नही किया गया और पर्यावरण के प्रति अपनी जिम्मेदारी नही समझी गयी तो प्रकृति भी अपना रौद्र रूप इसी तरह दिखाती रहेगी।

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