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इतिहास: आग्नेयास्त्र

सृष्टि में एक समय ऐसा था जब मानव अग्नि से पूर्णतया अनिभज्ञ था। लगभग 7000ई.पू.मानव द्वारा कठोर लकड़ियों के घर्षण व चकमक पत्थर की रगड़ से आग को उत्पन्न किया जाने लगा। युद्ध में अग्नि का प्रयोग आरंभ करने संबंधी निश्चित प्रमाण अभी तक प्राप्त नहीं हुए हैं। लेकिन यह कहा जा सकता है कि शत्रु को क्षति पहुंचाने की दृष्टि से आग के गोले बनाकर फेंकने का प्रयोग कबिलाई संस्कृति में शुरू हो गया था। वहीं आग्नेयास्त्रों की आरंभिक अवस्था है। आरंभिक अवस्था की बंदूके लगभग 1327 ई.में पुराने डिजाइन की सोडा बोतल की तरह होती थी, जिसमें नालपृष्ठ पर एक छिद्र होता था। इस छिद्र में लाल गर्म तार को स्पर्श करके बंदूक दागी जाती थी। हस्तचलित हल्की बंदूके 1350ई.के लगभग अस्तित्व में आने लगी। कबिलाई संस्कृति में शुरू हो गया था। वहीं आग्नेयास्त्रों की आरंभिक अवस्था है। आरंभिक अवस्था की बंदूके लगभग 1327 ई.में पुराने डिजाइन की सोडा बोतल की तरह होती थी, जिसमें नालपृष्ठ पर एक छिद्र होता था। इस छिद्र में लाल गर्म तार को स्पर्श करके बंदूक दागी जाती थी। हस्तचलित हल्की बंदूके 1350ई.के लगभग अस्तित्व में आने लगी। वे केवल पीतल व लोहे की नाल मात्र होती थी। इन बन्दूको को एक बार चलाने के पश्चात् नाल ठण्डी होने तक इनको दुबारा प्रयोग में नहीं लिया जा सकता था। अतः इस प्रकार की बंदूकों की आवश्यकता महसूस हुई जिसका पिछला हिस्सा तापरोधी हो । परिणाम स्वरूप बंदूकों का पृष्ठ भाग लकड़ी का बनाया जाने लगा जो कि दस्ता कहलाया। यह भाग पूर्णतः तापरोधी था। समय के साथ -साथ बंदूकों के अनेक यांत्रिक रुप जैसे ताडे़दार, पत्थर कला, टोपीदार, कारतूसी आदि प्रचलन में आने लगे।
17वीं शती व उसके बाद आग्नेयास्त्रों का उपयोग अत्यधिक मात्रा में किया जाने लगा। तात्कालिक शासकों द्वारा इसे शत्रु पर दूर से वार करने के कारण स्वयं के लिए अधिक सुरक्षित व इसकी मारक क्षमता अधिक होने के कारण शत्रु के लिए अधिक घातक माना जाता था।

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