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बैलगाड़ी का फंडा


गति को गति देने के लिए सदियों तक संघर्ष करनेवाला बैलगाड़ी अब इतिहास बन चुका है। यातायत और सामानों की ढुलाई के इस साधन का झारखंड के इस सुदूरवर्ती क्षेत्र में प्रवेश का मामला शोध का विषय हो सकता है परन्तु इस तथ्य को लेकर कोई संशय नहीं है कि इसका स्मरण आज भी रोमांचक बना हुआ है।

रोमांच का यह मामला काफी दिलचस्प है क्योंकि वह पीढ़ी आज भी बनी हुई है जिसने बैलगाड़ी को अपने अंतिम सफर तय करते हुए देखा है। आज जमाना बदल चुका है। ट्रैक्टर, ट्रक, मोटर, मोपेड आदि सर्वसुलभ हो चुके हैं। यात्री बसों की भरमार है और सुदूरवर्ती गांवों के लिए भी यातायात के साधन सुलभ हो चुके हैं परन्तु इन सबके बीच "तो तो नो नो" के शंखनाद के साथ वे बैल आज कांति विहीन हो चुके हैं जिन्होंने कभी मुंशी प्रेमचंद तक को पात्र उपलब्ध कराने का कारनामा कर दिखाया है। हाट का दिन है, व्यापारिक गतिविधियों को गति देने के लिए बैलगाड़ी के काफिले की जरूरत है तो किलकारी मारते मस्तीखोर बच्चों को माल से भरे हुए उसी बैलगाड़ी के पीछे लटककर गाड़ीवान को तंग करने के अवसर की तलाश है।

यह सबकुछ अब अतीत बन चुका है और हाट बाजार में व्यापार करनेवाले छोटे व्यापारियों के साथ साथ गुदगुदी करते बारात की शान भी अतीत बन गया है। ऐसे में इनके लिए मोपेड पहली पसंद बन चुकी है। बारात अभी भी निकलती है और मस्तीखोर बच्चे भी हैं परन्तु अब उनकी प्राथमिकताएं बदल चुकी है। किसान भी अब जुतहा बैल तक सीमित हो चुका हैं और गाड़ी में जुतने वाले नस्लों की बुनियाद भी गायब हैं। खलिहान से अनाज की ढुलाई के लिए ट्रैक्टर के काफिलों को गांव की गलियों का नाम पता मालूम हो चला है। कल तक ऐसा नहीं था और जो कुछ था वह पर्याप्त था। यहां बैलगाड़ियों के साथ साथ भैंसा गाड़ी भी अच्छा खासा लोकप्रिय हुआ करता था। स्थानीय भाषा में इसे "काड़ा गाड़ी" का सम्मान प्राप्त था। मस्तीजादों के लिए बैलगाड़ी जहाँ टाटा इंजन था तो काड़ा गाड़ी या भैंसागाड़ी को लेलंड इंजन की प्रतिष्ठा प्राप्त थी। चौपालों की चर्चा का यह एक दिलचस्प विषय हुआ करता था क्योंकि बैलगाड़ी में गति थी तो भैंसागाड़ी के पास ताकत।

बताते चलें कि व्यापारियों को गति की जरूरत अधिक थी तो इस कारण से उनके बीच बैलगाड़ी की मांग अधिक थी। अर्थशास्त्र के सामान्य नियमों के कारण जब बैलगाड़ी की मांग अधिक थी तो उसकी इज्जत भी कहीं अधिक थी। ऐसे में, बैलगाड़ी के दोनों बैलों के गले में टुनटुनाते घंटी और मूंगा की माला के साथ बैलगाड़ी पर लटकते लालटेन की याद आज भी मन को रोमांचित महसूस करने के लिए काफी जान पड़ती है। भावी पीढ़ियों के लिए यह रोमांच यकीनन अतीत के पन्नों में गुम होकर रह जाएगा क्योंकि हाट बाजारों पर अब मोपेड ने कब्जा जमा लिया है, किसानों की प्राथमिकताएं बदल चुकी है और बच्चों की मौज मस्ती का दायरा भी सिमट चुका है। ऐसे में जबकि सामाजिक संवेदनाएं लकवाग्रस्त हो रही हैं, अतिवाद से गांव की गलियां लहुलुहान हैं और भौतिकता अपने वीभत्स स्वरूप के साथ सामने है तब क्या चिर प्रश्न यह नहीं खड़ा हो रहा है कि तमाम साधनों की उपलब्धता के बाद भी हम बैलगाड़ी के कारगर विकल्प की तलाश नहीं कर पाए हैं?©केदार

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