logo
Select Language
Hindi
Bengali
Tamil
Telugu
Marathi
Gujarati
Kannada
Malayalam
Punjabi
Urdu
Oriya

साथीयों हमें ऐसी सरकार बनानी है

हमें ऐसी सरकार लानी है जो इंसिन को इंसान‌ समझे, संविधान की रक्षा करे, नफरत और दमन न करे,
संसद को जींदा करे, शिक्षा से आतंक खत्म करे, रोज़गार सृजन को प्राथमिकता दे, लाभप्रद सरकरी उद्धम न बेचे, इलेक्टोरल बांड की जांच हो धर्म स्थान को राज सत्ता से अलग करे, रेल गगरीयों मे बूजूरगों का कांसेशन ग्रामीण छेऋ में स्टेशन हो,

12543 views

Comment
  • Kaniz Fatima

    https://thernsolution.com/R.Q.SOCIAL/

  • Kaniz Fatima

    .👉 ये वही कमल का फूल है, जिसका बटन दबाने से; ड्राइविंग लाईसेंस 250 मे बनता था अब 5500 में बनता है! 👉 ये वही कमल का फूल है, जिसका बटन दबाने से; स्टील की कीमत 3600 रुपये से अब 6500 रुपए हो गई! 👉 ये वही कमल का फूल है, जिसका बटन दबाने से; जो सिलेंडर 350 रु. में था अब वही 1000 रुपए में है! 👉 ये वही कमल का फूल है, जिसका बटन दबाने से; देश में 55 लाख करोड़ का कर्ज़ था अब वही 215 लाख करोड़ है! 👉 ये वही कमल का फूल है, जिसका बटन दबाने से बेरोजगारी 2% से 65% हो गई! 👉 ये वही कमल का फूल है, जिसका बटन दबाने से गरीबी रेखा 40 करोड़ थी अब 80 करोड़ है! 👉 ये वही कमल का फूल है, जिसका बटन दबाने से सरसों का तेल 70 में था अब 200 में है! 👉 ये वही कमल का फूल है, जिसका बटन दबाने से 20 से अधिक चीनी मिलें बंद हो गई! 👉 ये वही कमल का फूल है, जिसका बटन दबाने से पेट्रोल 70 में था अब 100 में है! 👉 ये वही कमल का फूल है, जिसका बटन दबाने से छात्र छात्राओं की शिक्षा छींन ली गई! 👉 ये वही कमल का फूल है, जिसका बटन दबाने से गरीबों पर अत्याचार होते हैं! 👉 ये वही कमल का फूल है, जिसका बटन दबाने से 4.5 लाख युवाओं की नौकरी छिन लि गई! 👉 ये वही कमल का फूल है, जिसका बटन दबाने से बलात्कारीयों का हौसला बढ़ गया! 👉 ये वही कमल का फूल है, जिसका बटन दबाने से गुंडो का राज कायम है! 👉 ये वही कमल का फूल है, जिसका बटन दबाने से 24 घंटे बिजली कितनी बार आती जाती है किसी को नही पता! 👉 ये वही कमल का फूल है, जिसका बटन दबाने से हर साल 10 लाख रोजगार देने का वादा था लेकिन उसके बजाय इन्हौनें लोगों की लाखों नौकरियां छींन ली! 👉 ये वही कमल का फूल है, जिसका बटन दबाने से रेलवेे बेच दिया गया! 👉 ये वही कमल का फूल है, जिसका बटन दबाने से एयरपोर्ट बेच दिये गए! 👉 ये वही कमल का फूल है, जिसका बटन दबाने से; किसानों को गन्ने की फसलों का समय पर भुगतान नहीं मिल रहा है! 👉 ये वही कमल का फूल है, जिसका बटन दबाने से किसानों को सिंचाई के लिए मंहगी बिजली मिल रही है! 👉 ये वही कमल का फूल है, जिसका बटन दबाने से; अयोध्या में गरीबों के घरों पर बुल्डोजर चलवा दिये गए! 👉 ये वही कमल का फूल है, जिसका बटन दबाने से किसान सड़कों पर आ गये; और 870 किसान मारे गए! 👉 ये वही कमल का फूल है, जिसका बटन दबाने से; पुलवामा में देश के 50 जवानों पर अटैक करवाया गया। 👉 ये वही कमल का फूल है, जिसका बटन दबाने से थानों में दरोगा; गरीबों से बदसलूकी करते हैं। 👉 ये वही कमल का फूल है, जिसका बटन दबाने से;पूरे उत्तर प्रदेश की जनता बेरोजगार हो गई। 👉 ये वही कमल का फूल है, जिसका बटन दबाने से कितनी कंपनी बंद हो गई। 👉 ये वही कमल का फूल है, जिसका बटन दबाने से 3.5 लाख युवा; जो संविदा पर नौकरी कर रहे थे इन्हौनें वो छींन ली। 👉 ये वही कमल का फूल है, जिसका बटन दबाने से प्रदेश में 3 लाख करोड़ का निवेश आया; उसको लूट लिया और हजम कर गये। 👉 ये वही कमल का फूल है, जिसका बटन दबाने से कोरोना महामारी मे प्रदेशवासियों को मरने के लिए रोड पर छोड़ दिया गया। 👉ये वही कमल का फूल है, जिसका बटन दबाने से बैंक प्रइवेट कर दिया गया; और इनका विकास हिन्दू मुस्लिम; मन्दिर मस्जिद पाकिस्तान यहीं तक सीमित रह गया। बीजेपी हटाओ⚡ देश बचाओ!!

  • Kaniz Fatima

    .👉 ये वही कमल का फूल है, जिसका बटन दबाने से; ड्राइविंग लाईसेंस 250 मे बनता था अब 5500 में बनता है! 👉 ये वही कमल का फूल है, जिसका बटन दबाने से; स्टील की कीमत 3600 रुपये से अब 6500 रुपए हो गई! 👉 ये वही कमल का फूल है, जिसका बटन दबाने से; जो सिलेंडर 350 रु. में था अब वही 1000 रुपए में है! 👉 ये वही कमल का फूल है, जिसका बटन दबाने से; देश में 55 लाख करोड़ का कर्ज़ था अब वही 215 लाख करोड़ है! 👉 ये वही कमल का फूल है, जिसका बटन दबाने से बेरोजगारी 2% से 65% हो गई! 👉 ये वही कमल का फूल है, जिसका बटन दबाने से गरीबी रेखा 40 करोड़ थी अब 80 करोड़ है! 👉 ये वही कमल का फूल है, जिसका बटन दबाने से सरसों का तेल 70 में था अब 200 में है! 👉 ये वही कमल का फूल है, जिसका बटन दबाने से 20 से अधिक चीनी मिलें बंद हो गई! 👉 ये वही कमल का फूल है, जिसका बटन दबाने से पेट्रोल 70 में था अब 100 में है! 👉 ये वही कमल का फूल है, जिसका बटन दबाने से छात्र छात्राओं की शिक्षा छींन ली गई! 👉 ये वही कमल का फूल है, जिसका बटन दबाने से गरीबों पर अत्याचार होते हैं! 👉 ये वही कमल का फूल है, जिसका बटन दबाने से 4.5 लाख युवाओं की नौकरी छिन लि गई! 👉 ये वही कमल का फूल है, जिसका बटन दबाने से बलात्कारीयों का हौसला बढ़ गया! 👉 ये वही कमल का फूल है, जिसका बटन दबाने से गुंडो का राज कायम है! 👉 ये वही कमल का फूल है, जिसका बटन दबाने से 24 घंटे बिजली कितनी बार आती जाती है किसी को नही पता! 👉 ये वही कमल का फूल है, जिसका बटन दबाने से हर साल 10 लाख रोजगार देने का वादा था लेकिन उसके बजाय इन्हौनें लोगों की लाखों नौकरियां छींन ली! 👉 ये वही कमल का फूल है, जिसका बटन दबाने से रेलवेे बेच दिया गया! 👉 ये वही कमल का फूल है, जिसका बटन दबाने से एयरपोर्ट बेच दिये गए! 👉 ये वही कमल का फूल है, जिसका बटन दबाने से; किसानों को गन्ने की फसलों का समय पर भुगतान नहीं मिल रहा है! 👉 ये वही कमल का फूल है, जिसका बटन दबाने से किसानों को सिंचाई के लिए मंहगी बिजली मिल रही है! 👉 ये वही कमल का फूल है, जिसका बटन दबाने से; अयोध्या में गरीबों के घरों पर बुल्डोजर चलवा दिये गए! 👉 ये वही कमल का फूल है, जिसका बटन दबाने से किसान सड़कों पर आ गये; और 870 किसान मारे गए! 👉 ये वही कमल का फूल है, जिसका बटन दबाने से; पुलवामा में देश के 50 जवानों पर अटैक करवाया गया। 👉 ये वही कमल का फूल है, जिसका बटन दबाने से थानों में दरोगा; गरीबों से बदसलूकी करते हैं। 👉 ये वही कमल का फूल है, जिसका बटन दबाने से;पूरे उत्तर प्रदेश की जनता बेरोजगार हो गई। 👉 ये वही कमल का फूल है, जिसका बटन दबाने से कितनी कंपनी बंद हो गई। 👉 ये वही कमल का फूल है, जिसका बटन दबाने से 3.5 लाख युवा; जो संविदा पर नौकरी कर रहे थे इन्हौनें वो छींन ली। 👉 ये वही कमल का फूल है, जिसका बटन दबाने से प्रदेश में 3 लाख करोड़ का निवेश आया; उसको लूट लिया और हजम कर गये। 👉 ये वही कमल का फूल है, जिसका बटन दबाने से कोरोना महामारी मे प्रदेशवासियों को मरने के लिए रोड पर छोड़ दिया गया। 👉ये वही कमल का फूल है, जिसका बटन दबाने से बैंक प्रइवेट कर दिया गया; और इनका विकास हिन्दू मुस्लिम; मन्दिर मस्जिद पाकिस्तान यहीं तक सीमित रह गया। बीजेपी हटाओ⚡ देश बचाओ!!

  • Kaniz Fatima

    बिहार में मुसलमानों का आगमन, शरीफों की आमद ✍️ मोहम्मद तारिक ज़मां इतिहासकारों के अनुसार, बिहार में मुसलमानों का आगमन लगभग 1300 ईस्वी के आसपास हुआ। हालांकि, दूसरी ओर, इतिहासकारों ने 1263 ईस्वी को मखदूम जहां की जन्म तिथि के रूप में दर्ज किया है। इस आधार पर कहा जा सकता है कि बिहार में मुसलमानों का आगमन 1300 ईस्वी से पहले का है, क्योंकि मखदूम जहां का जन्म मनीर शरीफ में हुआ था। उनके पूर्वजों में सबसे पहले उनके परदादा, हज़रत इमाम मोहम्मद ताज फकीह थे, जो शाम (सीरिया - कुछ किताबों में फिलिस्तीन भी लिखा है) से हिजरत कर मनीर शरीफ (बिहार) आए थे। इतिहास की किताबों से यह भी पता चलता है कि बड़े पीर शेख अब्दुल कादिर जीलानी (रहमतुल्लाह अलैह) और मखदूम जहां के परदादा इमाम मोहम्मद ताज फकीह समकालीन थे। साथ ही, ख्वाजा गरीब नवाज़ अजमेरी का दौर भी लगभग यही था। (इस पर आगे कुछ विवरण उपलब्ध हैं।) मखदूम जहां और हज़रत महबूब-ए-इलाही निज़ामुद्दीन औलिया का दौर इतिहासकारों ने एक ही बताया है, या कह सकते हैं कि ये दोनों बुजुर्ग भी समकालीन थे। दिल्ली में मुसलमानों का आगमन बिहार से पहले ही हो चुका था। जो लोग भी हिंदुस्तान आए, वे या तो पंजाब के सीमावर्ती क्षेत्रों से या कश्मीर के रास्ते आए, सिवाय केरल और कोंकण (गुजरात) की इतिहास को छोड़कर। उसी तरह, बिहार आने वाले लोग भी दिल्ली होते हुए ही आए थे। मखदूम जहां के लगभग डेढ़ से ढाई सौ साल बाद, आज़माबाद, दानापुर, फुलवारी शरीफ, शहसराम, अमझर शरीफ, अरोल, देओरा, हिल्सा, इस्लामपुर, फतुहा, राजगीर, नवादा और बिहार के अन्य क्षेत्रों में औलिया अल्लाह और उनके अनुयायियों के आगमन का इतिहास मिलता है। कुछ सूफी मखदूम जहां के समकालीन भी थे, जिनमें मखदूम रास्ती (फुलवारी शरीफ), इब्राहिम बिया आदि शामिल हैं। वास्तव में, मनीर और बिहार शरीफ को ही मुसलमानों की "सबसे पुरानी बस्ती" कहा जा सकता है। यहां यह लिखना आवश्यक समझता हूं कि मनीर का वास्तविक नाम इतिहास में "शाहपुर मनीर" है, लेकिन अब इसे केवल मनीर के नाम से जाना जाता है। किताबों से यह भी पता चलता है कि मखदूम जहां के परदादा से भी पहले मनीर में मुसलमान मौजूद थे, क्योंकि जब इमाम ताज फकीह ने अज़ान देना चाहा, तो वहां के एक मुसलमान ने उन्हें रोका कि यहां का राजा बहुत ज़ालिम है, वह परेशान करेगा। (और इस तरह हम पूरी तरह से यकीन के साथ कह सकते हैं कि वह मुस्लिम बुजुर्ग, जिन्होंने इमाम ताज फकीह (रहमतुल्लाह अलैह) को अज़ान देने से रोका, वे भी अरब वंश के ही होंगे।) जब हम मखदूम जहां और उनके परदादा के बीच के समय का अध्ययन करते हैं, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि दक्षिणी बिहार में मुसलमानों की कुछ आबादी बस चुकी थी। आबादी बहुत कम थी, इसलिए उनका शोषण भी खूब हो रहा था। उस समय कुछ लोग धीरे-धीरे इस्लाम धर्म को अपनाने भी लगे थे। बिहार के फातिह, मलिक इब्राहिम बिया, अफगानिस्तान के गजनी से अपने सैन्य दस्ते के साथ संभवतः 1300 ईस्वी के प्रारंभ में या उसके आसपास बिहार आए। उन्होंने यहां के ज़ालिम शासकों और चोल वंश के शासक से युद्ध किया और शहीद हो गए। मलिक इब्राहिम बिया के समय में औलिया अल्लाह और अब्दाल का सिलसिला बढ़ा, जो विभिन्न क्षेत्रों में धर्म प्रचार के लिए फैल गए। कहा जाता है कि मलिक इब्राहिम बिया की नमाज़-ए-जनाज़ा मखदूम जहां ने ही पढ़ाई थी। मलिक इब्राहिम बिया के लगभग दो सौ साल बाद शेर शाह सूरी (फरीद खान) का शासन शुरू हुआ, जो लगभग पांच साल तक चला। बाबर और शेर शाह सूरी के शुरुआती संबंधों से लेकर संबंध बिगड़ने तक के बारे में सभी पढ़े-लिखे लोग जानते हैं। मेरे अनुसार, वास्तव में बिहार में मुसलमानों का बसना, गांव-गांव में फैलना और जंगलों को काटकर बस्तियों का निर्माण मलिक इब्राहिम बिया के समय से शुरू हुआ और शेर शाह सूरी के शासन में तेजी से बढ़ा, खासकर दक्षिणी बिहार में। उस समय हिंदू धर्म की बजाय बौद्ध धर्म का प्रभाव अधिक था, और इसी कारण यह प्रांत बिहार (विहार/बिहार) के नाम से प्रसिद्ध हुआ। यदि अब विश्लेषण किया जाए, तो बिहार में मुसलमानों का आगमन हुए लगभग 1000 साल से अधिक समय हो चुका है। खुद मखदूम जहां के परदादा ताज फकीह, ख्वाजा गरीब नवाज़ से पहले मनीर (बिहार) आकर बस चुके थे, हालांकि वे मनीर में जीवनभर नहीं रहे, बल्कि अपने वतन लौट गए, जैसा कि इतिहासकारों ने लिखा है। "आसार-ए-मनीर" के लेखक मौलाना मुरादुल्लाह मनीरी के हवाले से इस बात की पुष्टि होती है कि इमाम मोहम्मद ताज फकीह 576 हिजरी में मनीर आए थे, जबकि इतिहासकारों ने ख्वाजा गरीब नवाज़ (रहमतुल्लाह अलैह) का हिंदुस्तान आगमन 586 हिजरी दर्ज किया है। यानी यह स्पष्ट हो जाता है कि ख्वाजा गरीब नवाज़ से दस साल पहले ही बिहार में मुसलमान बस चुके थे। अन्य विभिन्न किताबों के अध्ययन से भी यह सिद्ध हो चुका है कि बिहार में मुसलमान, ख्वाजा गरीब नवाज़ के हिंदुस्तान आने से पहले ही बस चुके थे। ▪️ बाबर का मनीर शरीफ आना दसवीं कक्षा तक स्कूल में इतिहास पढ़ा है और विशेष रूप से बाबर के बारे में रुचि के साथ पढ़ा। लेकिन आज मौलवी फसीहुद्दीन बल्खी (रहमतुल्लाह अलैह) की "तारीख-ए-मगध" पढ़ते समय पेज 174 से यह पता चला कि बाबर 936 हिजरी में मनीर शरीफ भी आया था और वहां कुछ दिन रहा। उसने मखदूम याह्या मनीरी के मज़ार की ज़ियारत की, मस्जिद में नमाज़ अदा की और बहुत सारा खैरात किया। फिर भोजपुर होकर पांचवें रमज़ान को आगरा वापस लौट गया। ▪️ बख्तियार खिलजी का मनीर शरीफ पहुंचना हमने ऊपर बाबर के मनीर शरीफ आने और शरफुद्दीन याह्या मनीरी के मज़ार की ज़ियारत का ज़िक्र किया था। जब सैयद शाहिद इकबाल की किताब "तज़किरा महदानवां" पढ़ रहा था, तो पेज 20 से पता चला कि बाबर से कई सौ साल पहले, 590 हिजरी/1192 ईस्वी के आसपास बख्तियार खिलजी मनीर पहुंचा था। उसे यकीन नहीं हुआ था कि बिहार में उसके आगमन से पहले ही इस्लाम मौजूद था। मौलाना सैयद मुरादुल्लाह मनीरी अपनी किताब "आसार-ए-मनीर" में लिखते हैं: "बख्तियार खिलजी का आगमन जब बिहार में हुआ, उस समय मनीर शरीफ की हुकूमत हज़रत सुल्तान मखदूम सैयदना शेख याह्या मनीरी के हाथ में थी। आपने अपनी इच्छा से मनीर की हुकूमत बख्तियार खिलजी को सौंप दी। उन्होंने कहा कि मैं मुसलमानों का माल नहीं लेता। आपने कहा कि बादशाहत और रियासत वंशानुगत नहीं हैं, यह अल्लाह की देन है। अल्लाह जिसे चाहते हैं, देते हैं। यह बोझ मुझसे नहीं उठेगा, इबादत में रुकावट आती है। फिर आपने न्याय और इंसाफ की सलाह दी और मनीर की हुकूमत उनके हवाले कर दी और खुद तन्हाई में चले गए और अल्लाह की याद में मशगूल हो गए।" मजमून के स्रोत: ▪️ तारीख-ए-मगध - फसीहुद्दीन बल्खी ▪️ आसार-ए-मनीर - मुरादुल्लाह मनीरी ▪️ तज़किरा महदानवां - शाहिद इकबाल ▪️ हिस्ट्री ऑफ सूफिज़्म - अतहर अब्बास ▪️ भारत का इतिहास ▪️ अन्य लेखों और किताबों के माध्यम से भी... नोट: यह लेख मेरे निजी अध्ययन का परिणाम है। हो सकता है

  • Kaniz Fatima

    https://www.facebook.com/share/1BsZ9Gi4Ye/?mibextid=wwXIfr

  • Kaniz Fatima

    https://www.facebook.com/share/1BsZ9Gi4Ye/?mibextid=wwXIfr

  • Kaniz Fatima

    *Sahyog, हमारा समाज ।* आज के समय में Sahyog जैसी माइक्रोफाइनेंस संस्थाओं की आवश्यकता माइक्रोफाइनेंस: एक ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य माइक्रोफाइनेंस की अवधारणा ने 20वीं सदी के मध्य में आकार लेना शुरू किया। यह विचार सरल होते हुए भी क्रांतिकारी था—गरीब किसानों, महिलाओं और छोटे स्तर के उद्यमियों को बिना किसी जमानत के छोटे ऋण उपलब्ध कराना, ताकि वे अपनी मेहनत के बल पर आत्मनिर्भर बन सकें। माइक्रोफाइनेंस क्यों आवश्यक है?भारत जो की श्रमिक आबादी का केंद्र हैं—अक्सर के सपने मेहनत की कमी से नहीं, बल्कि पूंजी की कमी से अधूरे रह जाते हैं। आर्थिक बाधाएँ: छोटे दुकानदार, ठेले वाले, रिक्शा चालक या घरेलू कारीगरों के पास न तो पर्याप्त बचत होती है और न ही बैंकों तक आसान पहुँच। कर्ज़ का जाल: कई लोग स्थानीय साहूकारों से अत्यधिक ब्याज दर पर कर्ज़ लेने को मजबूर होते हैं, जिससे वे जीवन भर के कर्ज़ में फँस जाते हैं। छोटे सपने, सीमित ज़रूरतें: कोई अपनी छोटी दुकान बढ़ाना चाहता है, कोई ठेला लगाना, तो कोई माता-पिता अपने बच्चों की शिक्षा में निवेश करना चाहते हैं। सहयोग का मिशन: Sahyog केवल एक संस्था नहीं, बल्कि एक आंदोलन है। इसका उद्देश्य समाज के सबसे वंचित वर्गों को सशक्त बनाना है, ताकि वे गरिमा और आत्मसम्मान के साथ खड़े हो सकें। ब्याज-मुक्त ऋण प्रदान करके सहयोग ने यह सशक्त संदेश दिया है कि प्रगति का रास्ता केवल अमीरों तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि मेहनतकश आम लोगों के लिए भी खुला होना चाहिए। जामिया नगर, दिल्ली में एक सफल प्रयोग महज़ दो वर्षों में सहयोग ने यह सिद्ध कर दिया है कि जब नीयत सच्ची हो, तो सीमित संसाधनों से भी बड़ा बदलाव संभव है। *1,100 से अधिक सदस्य इस पहल से जुड़े हैं। ₹3.5 करोड़ से अधिक की बचत जुटाई गई है। ₹85 लाख से अधिक के ऋण वितरित किए गए हैं। 154 से अधिक परिवारों को प्रत्यक्ष लाभ मिला है।* एक जागरूक नागरिक की जिम्मेदारी: लेकिन क्या सहयोग अकेले इस जिम्मेदारी को निभा सकता है? निश्चित रूप से नहीं। यह आंदोलन तभी सफल हो सकता है, जब हम सभी अपनी भूमिका निभाएँ। विश्वास और समर्थन: ऐसी संस्थाओं पर भरोसा करें और अपनी क्षमता के अनुसार योगदान दें। ज़रूरतमंदों से जोड़ना: अपने आसपास के वास्तविक ज़रूरतमंदों को ऐसी पहलों से जोड़ें। सामाजिक जिम्मेदारी: जब समाज का एक हिस्सा पीछे रह जाता है, तो पूरा राष्ट्र प्रभावित होता है। वास्तविक प्रगति वही है, जब सभी साथ आगे बढ़ें। Sahyog से जुड़े, समाज को मज़बूत बनाये ।

  • Kaniz Fatima

    *Sahyog, हमारा समाज ।* आज के समय में Sahyog जैसी माइक्रोफाइनेंस संस्थाओं की आवश्यकता माइक्रोफाइनेंस: एक ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य माइक्रोफाइनेंस की अवधारणा ने 20वीं सदी के मध्य में आकार लेना शुरू किया। यह विचार सरल होते हुए भी क्रांतिकारी था—गरीब किसानों, महिलाओं और छोटे स्तर के उद्यमियों को बिना किसी जमानत के छोटे ऋण उपलब्ध कराना, ताकि वे अपनी मेहनत के बल पर आत्मनिर्भर बन सकें। माइक्रोफाइनेंस क्यों आवश्यक है?भारत जो की श्रमिक आबादी का केंद्र हैं—अक्सर के सपने मेहनत की कमी से नहीं, बल्कि पूंजी की कमी से अधूरे रह जाते हैं। आर्थिक बाधाएँ: छोटे दुकानदार, ठेले वाले, रिक्शा चालक या घरेलू कारीगरों के पास न तो पर्याप्त बचत होती है और न ही बैंकों तक आसान पहुँच। कर्ज़ का जाल: कई लोग स्थानीय साहूकारों से अत्यधिक ब्याज दर पर कर्ज़ लेने को मजबूर होते हैं, जिससे वे जीवन भर के कर्ज़ में फँस जाते हैं। छोटे सपने, सीमित ज़रूरतें: कोई अपनी छोटी दुकान बढ़ाना चाहता है, कोई ठेला लगाना, तो कोई माता-पिता अपने बच्चों की शिक्षा में निवेश करना चाहते हैं। सहयोग का मिशन: Sahyog केवल एक संस्था नहीं, बल्कि एक आंदोलन है। इसका उद्देश्य समाज के सबसे वंचित वर्गों को सशक्त बनाना है, ताकि वे गरिमा और आत्मसम्मान के साथ खड़े हो सकें। ब्याज-मुक्त ऋण प्रदान करके सहयोग ने यह सशक्त संदेश दिया है कि प्रगति का रास्ता केवल अमीरों तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि मेहनतकश आम लोगों के लिए भी खुला होना चाहिए। जामिया नगर, दिल्ली में एक सफल प्रयोग महज़ दो वर्षों में सहयोग ने यह सिद्ध कर दिया है कि जब नीयत सच्ची हो, तो सीमित संसाधनों से भी बड़ा बदलाव संभव है। *1,100 से अधिक सदस्य इस पहल से जुड़े हैं। ₹3.5 करोड़ से अधिक की बचत जुटाई गई है। ₹85 लाख से अधिक के ऋण वितरित किए गए हैं। 154 से अधिक परिवारों को प्रत्यक्ष लाभ मिला है।* एक जागरूक नागरिक की जिम्मेदारी: लेकिन क्या सहयोग अकेले इस जिम्मेदारी को निभा सकता है? निश्चित रूप से नहीं। यह आंदोलन तभी सफल हो सकता है, जब हम सभी अपनी भूमिका निभाएँ। विश्वास और समर्थन: ऐसी संस्थाओं पर भरोसा करें और अपनी क्षमता के अनुसार योगदान दें। ज़रूरतमंदों से जोड़ना: अपने आसपास के वास्तविक ज़रूरतमंदों को ऐसी पहलों से जोड़ें। सामाजिक जिम्मेदारी: जब समाज का एक हिस्सा पीछे रह जाता है, तो पूरा राष्ट्र प्रभावित होता है। वास्तविक प्रगति वही है, जब सभी साथ आगे बढ़ें। Sahyog से जुड़े, समाज को मज़बूत बनाये ।

  • Kaniz Fatima

    *Sahyog, हमारा समाज ।* आज के समय में Sahyog जैसी माइक्रोफाइनेंस संस्थाओं की आवश्यकता माइक्रोफाइनेंस: एक ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य माइक्रोफाइनेंस की अवधारणा ने 20वीं सदी के मध्य में आकार लेना शुरू किया। यह विचार सरल होते हुए भी क्रांतिकारी था—गरीब किसानों, महिलाओं और छोटे स्तर के उद्यमियों को बिना किसी जमानत के छोटे ऋण उपलब्ध कराना, ताकि वे अपनी मेहनत के बल पर आत्मनिर्भर बन सकें। माइक्रोफाइनेंस क्यों आवश्यक है?भारत जो की श्रमिक आबादी का केंद्र हैं—अक्सर के सपने मेहनत की कमी से नहीं, बल्कि पूंजी की कमी से अधूरे रह जाते हैं। आर्थिक बाधाएँ: छोटे दुकानदार, ठेले वाले, रिक्शा चालक या घरेलू कारीगरों के पास न तो पर्याप्त बचत होती है और न ही बैंकों तक आसान पहुँच। कर्ज़ का जाल: कई लोग स्थानीय साहूकारों से अत्यधिक ब्याज दर पर कर्ज़ लेने को मजबूर होते हैं, जिससे वे जीवन भर के कर्ज़ में फँस जाते हैं। छोटे सपने, सीमित ज़रूरतें: कोई अपनी छोटी दुकान बढ़ाना चाहता है, कोई ठेला लगाना, तो कोई माता-पिता अपने बच्चों की शिक्षा में निवेश करना चाहते हैं। सहयोग का मिशन: Sahyog केवल एक संस्था नहीं, बल्कि एक आंदोलन है। इसका उद्देश्य समाज के सबसे वंचित वर्गों को सशक्त बनाना है, ताकि वे गरिमा और आत्मसम्मान के साथ खड़े हो सकें। ब्याज-मुक्त ऋण प्रदान करके सहयोग ने यह सशक्त संदेश दिया है कि प्रगति का रास्ता केवल अमीरों तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि मेहनतकश आम लोगों के लिए भी खुला होना चाहिए। जामिया नगर, दिल्ली में एक सफल प्रयोग महज़ दो वर्षों में सहयोग ने यह सिद्ध कर दिया है कि जब नीयत सच्ची हो, तो सीमित संसाधनों से भी बड़ा बदलाव संभव है। *1,100 से अधिक सदस्य इस पहल से जुड़े हैं। ₹3.5 करोड़ से अधिक की बचत जुटाई गई है। ₹85 लाख से अधिक के ऋण वितरित किए गए हैं। 154 से अधिक परिवारों को प्रत्यक्ष लाभ मिला है।* एक जागरूक नागरिक की जिम्मेदारी: लेकिन क्या सहयोग अकेले इस जिम्मेदारी को निभा सकता है? निश्चित रूप से नहीं। यह आंदोलन तभी सफल हो सकता है, जब हम सभी अपनी भूमिका निभाएँ। विश्वास और समर्थन: ऐसी संस्थाओं पर भरोसा करें और अपनी क्षमता के अनुसार योगदान दें। ज़रूरतमंदों से जोड़ना: अपने आसपास के वास्तविक ज़रूरतमंदों को ऐसी पहलों से जोड़ें। सामाजिक जिम्मेदारी: जब समाज का एक हिस्सा पीछे रह जाता है, तो पूरा राष्ट्र प्रभावित होता है। वास्तविक प्रगति वही है, जब सभी साथ आगे बढ़ें। Sahyog से जुड़े, समाज को मज़बूत बनाये ।

  • Kaniz Fatima

    हिन्दू राष्ट्र के लिये कशमकश अभी गुरू तेग बहादर साहिब की शहादत का 350 वां वर्ष सम्पन्न हुआ , इस दौरान पूरा आरएसएस, भाजपा और सिख संस्थाओं ने सम्मेलन, य़ात्रायें आदि की क्योंकि यह बताने में कोई कोर कसर न छोड़ी कि गुरू तेग बहादर की शहादत तिलक जनेऊ अर्थात हिन्दू रक्षा के लिये हुई , विडंबना यह कि शिरोमणी गुरुद्वारा प्रबन्धक कमेटी दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी और अन्य सिख संस्थाओं ने भी इसी को आधार मान कर सम्मेलन और यात्राओं के आयोजन किये l मुझे लगा कि आर एस एस ने यह समझ लिया कि इस अवसर को भुनाया जा सकता है, सिखों में भी उसके प्रति सद संकेत जाएगा और मुस्लिम निशाने पर , जिससे हिन्दू को यकमुस्त किया जा सकता है , हर दीप पूरी मंत्री भारत सरकार ने इसको और तूल दे दिया जब उसने कथित गुरू साहिब की जूते यह बता कर प्रस्तुत किये कि यह उनके परिवार के पास आदर से सुरक्षित रहे l आस्था पर कौन सवाल उठाता ? उनके लिये भव्य यात्रा का आयोजन क्योंकि उन्हीं दिनों बिहार चुनाव थे इसलिये उनको वहीं तख्त श्री पटना साहिब को समर्पित l मुझे अहसास था कांग्रेस और अन्य दल इस पर कोई कदम नहीं उठायेंगे और मुस्लिम औरंगजेब के बहाने निशाने पर , वह हुआ भी परंतु इस आशंका को मैंने सलमान खुर्शीद कांग्रेस नेता और पूर्व विदेश मंत्री के सम्मुख प्रस्तुत किया , हालांकि उन को राजनीति का अहसास था परंतु फिर भी मेरी बात से इत्तफाक रखते हुए उन्होने यह मान लिया कि मुस्लिम की ओर से IMCR के माध्यम इस पर सम्मेलन किया जाये और इसका आयोजन इंडिया इसलामिक सांस्कृतिक केन्द्र दिल्ली में ही हो, जिसके लिये मुझे IMCR के अध्यक्ष मुहम्मद अदीब साहिब से बात कर लें l वे पहले से ही मेरे परिचित थे जब गुरुग्राम में नमाज का मुद्धा उठा उस समय से l मेरी उनसे बात हुई और वे मान गये जिसमें केन्द्री सिंघ सभा जिसकी स्थापना पूर्व लोक सभा अध्यक्ष हुकम सिंघ ने की थी जिनके साथ मुझे लगभग 10 वर्ष काम करने का अवसर मिला और गुरू तेग बहादर की शहादत को समर्पित सम्मेलन 24अगस्त 2025 को आहुत किया गया l इस बात पर चर्चा करते हुए मैने बताया कि सिख इतिहास को हिन्दू के इतिहास के तौर पर प्रस्तुत किया गया , मुगल सल्तनत को सिख विरोधी, जबकि इतिहास ऐसा नहीं बल्कि गुरु नानक से गुरू गोबिंद सिंघ तक उधर बाबर से लेकर औरंगजेब तक का इतिहास समकालीन है और उस दौरान आपसी चाहे सम्बंध खट्टे मीठे थे परंतु मित्रवत भी रहे l मुगल काल में चाहे सत्ता मुगल थी परंतु प्रशासन पर हिन्दू का उच्च वर्ग ही स्थापित रहा उसी ने शोषित को दबाये रखा जबकि गुरुओं ने शोषित को मान सम्मान जीवन प्रदान किया यही नहीं मुगल सल्तनत भी इस के प्रति गुरुओं के साथ क्योंकि इस्लाम इकबाल, इन्साफ और हक पर अधारित समता मूलक जिससे हिन्दू के उच्च वर्ग में आशंकाएं उभरती चली गयी , उसी का कारण था गुरुओं के प्रति सल्तनत को उग्र किया गया, नतीजा गुरू अरजन और फिर गुरू तेग बहादर की शहादत l यहीँ बस नहीं जब गुरु गोबिंद सिंघ पर हमला चारों साहबजादे शहीद करवाने में भी इन्ही का हाथ l प्रस्तुत किया तिलक और जनेऊ को रक्षक के तौर पर , जबकि तिलक जनेऊ को धारण तो यही उच्च वर्ग ही कर सकता था और मन्दिर संचालन का अधिकार भी इन्ही के हाथों ,फिर तिलक जनेऊ और मन्दिर तोड़ कर मस्जिद बनाने का सवाल ही नहीं उठता ? बल्कि उस दौरान मन्दिर के साथ स्टा कर मस्जिद बनायी गयी ताकि आपसी सद्भाव का संचार हो तो वह सवाल ही निरर्थक l गुरू तेग बहादर के खिलाफ कोई वारंट थोड़े ही था जबकि उनके कारण ही हिन्दोस्तान और असम के बीच संधि हुई और हिन्दोस्तान ढाका तक फैल गया l गुरू तेग बहादर तो उस शोषित के लिये उनको सम्मान जीवन जीने के लिये औरंगजेब से बात करने के लिये चले ताकि उनको बराबरी का हक मिले तभी वे पटियाला के पास बहादर गढ़ किले में चौमासे के दिनों ठहरे आज भी एक तरफ मस्जिद और उसकी बगल में गुरुद्वारा स्थित है , जब वे लखन माजरा रोहतक के पास पहूँचे तो पूरा हिन्दोस्तान उनके साथ हो लिया उसी का मुद्धा बनाते हुए उसी शाषित उच्च हिन्दू ने बादशाह को शिकायत बग़ावत की उसी पर उनको बन्दी बना लिया गया मुद्धा अन्देखा कर दिया l बस यही है विडंबना जिसे मैने प्रस्तुत किया जिसका पूरे देश भर में असर दिखा उसके बाद 4 अक्टूबर 2025 को जयपुर उसके बाद 4 जनवरी 2026 को पूना में सेमीनार आयोजित किये गये l मुझे अहसास है कि आर एस एस अपने 100 वें वर्ष पर माहौल बनाने में लगी है कि यह हिंदू राष्ट्र जिसकी कल्पना उसने 1937 में की थी जिसके कारण हिन्दोस्तान का विभाजन हुआ , इन 11 वर्षों में पूरा ज़ोर इसी को प्रदर्शित कर रही है अनेकों कथा वाचक ऐसी मनसा से लगाए गये , राम मन्दिर निर्माण किह बिधि से भी हो , मुस्लिम ही निशाने पर फिर भी इस प्रयास ने लोगों में जागरुकता पनपी है सिख, मुस्लिम , जाट और मैने पूना में अहसास किया कि मराठा भी यह सोचने लगा है कि उन्हें बरगलाया जा रहा है ज़रूरत इस बात की है कि कोई इसका नेतृत्व कर सके अन्यथा किसान आंदोलन के समय इसका अहसास किया था , जो अन्ना आंदोलन के समय आर एस एस की चाल में फंसे थे वे भी अपनी आवाज बुलन्द करने में लगे हैं , यही आर एस एस के लिये चिंता का सब्ब बना है अब तो आये दिन कोई न कोई मुद्धा खड़ा हो जाता है जिससे मोदी सरकार फंसती नज़र आने लगती है l यह सही है कि उसने डा अंबेडकर के आरक्षण पर हउआ दिखा कर उस 22.50 फीसद को अपने साथ जोड़े है और आर एस एस के 15 फीसद वोट से 37 फीसद वोट को उसने अपने साथ जोड़ा है यदि कांग्रेस खुद को समझने का प्रयास करे तो उसके साथ 24 फीसद वोट तो बिना कुछ किये जुड़े हैं यदि सिख साथ आता है तो हिंदू का सेक्यूलर 10 फीसद वोट का इजाफा हो जाता है और 19 फीसद वोट तो कांग्रेस के पास तब भी जब उसे सभी छोड़ गये थे l मुझे खुशी है कि अब कयी तरफ से आवाजें आने लगी हैं कि ऐसे सेमिनार और भी किये जायें, अब तो खुलकर सिख भी इस विचार को आत्मसात करने लगे हैं , यह भी मांग उठी है इसे अभियान के तौर पर लिया जाये l आशा करता हूँ कि वे सभी लोग आगे आयेंगे जो नफरत से निजात मिले सबके हक और हकूक सुरक्षित हों , मिलकर चलें