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धर्म कर्म या निस्वार्थ सेवा

धरती बनी तो सनातन आए वो समय मानव में केवल ईश्वर और आत्मा वो शरीर जो आत्मा का निवास स्थान मानते थे

कलयुग में ईश्वर, आत्मा , शरीर से आगे लक्ष्मी जी हैं। हर किसी को अहम, अहंकार, स्वार्थ, दिखावा, घमंड पहले स्थान में होता हैं।

धर्म,अर्थ,काम,मोक्ष ये चार के लिए ही जीवन को जीना होता है।

धर्म- शिक्षा ले या न लें।
अर्थ- जीवन के लिए पैसा और ऐश्वर्य
काम- परिवार वृद्धि, मनोकामापूर्ति
मोक्ष- अंत में शरीर से आत्मा अलग होना।

आज की संस्कृति से सनातनी बहुत बहुत अलग होते जा रहे हैं बाकि धर्म और संस्कृियों को जीना ही लक्ष्य मानते हैं।
शेष

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