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अनूठे रिती रिवाज भारतीय संस्कृति मे भी जीवित है

सावर, सावर कस्बे के मालियान नयागांव मे राजस्थान में ग्रामीण क्षेत्रों में अनूठे रिती रिवाज भारतीय संस्कृति की एक अलग छटा को दशार्ते हैं। और जताते हैं कि भारतीय संस्कृति में इन्ही अनूठे आयोजनों से एकता भाईचारा बना रहता है। भारतीय संस्कृति का ऐसा ही नजारा सावर क्षेत्र के मालियों के नया गांव में देखने को मिलता है जहां पर लोग जात-पांत को भुलाकर धुणी माता के स्थान पर अपने-अपने घर से राशन लाकर दाल-बाटी चूरमा बनाकर भोग लगाते हैं। धूणी माता का स्थान संत शिरोमणि पन्ना नाथ महाराज की तपोभूमि के नाम से जाना जाता है। बताया जाता है कि गांव में इस परंपरा का निर्वाह सुख शांति व आने वाली प्राकृतिक आपदा की रोकथाम के उद्देश्य से प्रतिवर्ष किया जाता है। ग्रामीण बताते हैं कि करीब सवा 260 साल पूर्व है पन्ना नाथ ने यहां पर 12 वर्ष तक अखंड व कठोर तपस्या की थी। संत शिरोमणि पन्ना नाथ के आदेश के अनुसार ही गांव के सभी परिवार मंगसर सुदी दूज के दिन राशन सामग्री लेकर तपोभूमि पर पहुंचते हैं और जात पात को भूलकर चूरमा-बाटी बनाकर धुणी के स्थान पर भोग लगाते हैं। गांव में धीरे-धीरे यह कार्यक्रम एक परंपरा बन गया है। मान्यता है कि इसी के चलते आज तक गांव में ऐसी कोई प्राकृतिक आपदा या रोग नहीं आया जिससे कोई हानि पहुंची हो। ग्रामीण बताते हैं कि 12 साल की तपस्या के बाद संत शिरोमणि पन्ना नाथ ने यहां से चलकर अंराई तहसील के भामोलाव गांव में जाकर जीवित समाधि ली थी। भामोलाव गांव में समाधि स्थल बना हुआ है। मालियों का नया गांव से दूसरे गांव में जाकर बसे लोग आज भी इस परंपरा को निभाने के लिए इसी दिन गांव में आते हैं और सामूहिक रूप से रसोई बना कर भोग लगाते हुए सुख समृद्धि की कामना करते हैं।

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