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आइए जानें गुरु पूर्णिमा के महत्व को, 5 जुलाई को है गुरु पूर्णिमा

पंंडित वेदप्रकाश शास्त्री ने परम पूज्य सद्गुरुदेव की महिमा को बताते हुए बताया कि, ‘शास्त्रों में गु का अर्थ बताया गया है.। अंधकार या मूल अज्ञान और रु का का अर्थ किया गया है. उसका निरोधक। गुरु को गुरु इसलिए कहा जाता है कि वह अज्ञान तिमिर का ज्ञानांजन-शलाका से निवारण कर देता है। अर्थात अंधकार को हटाकर प्रकाश की ओर ले जाने वाले को ‘गुरु’ कहा जाता है।

अज्ञान तिमिरांधस्य ज्ञानांजन शलाकया ।

चक्षुन्मीलितम् येन् तस्मै श्री गुरुवै नमः।।

गुरु तथा देवता में समानता के लिए एक श्लोक में कहा गया है कि, ‘जैसी भक्ति की आवश्यकता देवता के लिए है, वैसी ही गुरु के लिए भी। बल्कि सदगुुुरु की कृपा से ईश्वर का साक्षात्कार भी संभव है।’


 गुरु पूर्णिमा का पर्व पूरे देश में बड़ी ही श्रद्धापूर्वक और भक्तिभाव से मनाया जाता है। इस दिन गुरु की पूजा की जाती है और उन्हें सम्मान प्रदान किया जाता है। साथ ही उनकी महिमा का बखान किया जाता है।

गुरु पूर्णिमा का पर्व गुरु को समर्पित है। मान्यता है कि बिना गुरु के ज्ञान के प्राप्ति नहीं होती है। सच्चे गुरु की जब प्राप्ति हो जाती है तो जीवन से सभी प्रकार के अंधकार मिट जाते हैं।

प्रत्येक वर्ष आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाने की परंपरा है। इस दिन घर के बड़े बुजुर्गों और जिनसे भी आपने जीवन में कुछ न कुछ सीखा है, उनके प्रति सम्मान अर्पित करने का दिन है। 

इसके साथ ही पंंडित वेदप्रकाश शास्त्री ने  बताया कि इसी दिन ही महाभारत के रचयिता महर्षि वेदव्यास का अवतरण हुआ था।

प्रत्येक वर्ष गुरु पूर्णिमा के दिन महाभारत के रचयिता महर्षि वेद व्यास का अवतरण दिवस मनाया जाता है। व्यास जी को ही सभी 18 पुराणों का रचयिता माना गया है। कहीं कहीं गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है।


वर्षा ऋतु अध्यापन कार्य के लिए श्रेष्ठ  

विद्वानों के अनुसार अध्यापन कार्य के लिए वर्षा ऋतु को सबसे उपयुक्त माना गया हैए इसी कारण गुरु पूर्णिमा को वर्षा ऋतु में मनाया जाता है। माना जाता है वर्षा ऋतु के दौरान अधिक गर्मी और न अधिक सर्दी होती है। इसलिए पढ़ने के लिए यह समय सबसे अच्छा माना गया है। पुरातन काल में गुरुकुल में इस ऋतु में विद्यार्थियों के शिक्षण कार्य पर विशेष बल दिया जाता था। इस ऋतु में गुरु के चरणों में बैठकर ज्ञान प्राप्त करने पर बल दिया जाता है। यह समय ज्ञान, शांति, भक्ति और योग शक्ति को प्राप्त करने के लिए महत्वपूर्ण माना गया है।
गुरु की कृपा के अभाव में कुछ भी संभव नहीं है।

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