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मेरे अंदर तु, तेरे अंदर मैं...


धर्म जाति मानवीय प्रतिवाद से परे यह शब्दों का समूह, जीवन की वो सच्चाई बताती है जो कभी भी अपने अंदर की भावनाओं को ब्यर्थ नहीं जाने देती। और अगर किसी से कैह नहीं पाती तो अंदर अंदर जरूर महसूस करती है कि मेरे अंदर जो कुछ चल रहा है, वो सब तुम्हारे लिए है क्योंकि मैं भले ही कुछ तुमसे नहीं कैह पा रहा हूं लेकिन मेरे अंदर तु ही है। तब आपको समाने वाले का प्रतिक्रिया स्वरूप आपके मन में ये आभास होने लगता है कि शायद वह मेरे बारे में महसूस कर रहा है कि मैं भी तेरे अंदर ही हूं पर मैं कैह नहीं पा रहा हूं। इसलिए "मेरे अंदर तु, तेरे अंदर मैं" प्रेम की वो आस्था और समर्पण है जो अनंत सीमाओं और दूरियों को नापते हुए, आपके हृदय में वास करने लगती है। और आप एक दूसरे के हो जाते हैं। पर यह मनुष्य से मनुष्य के लिए भी होता है, मनुष्य से दूसरे जीवों के लिए भी होता है, और मनुष्य से ईश्वर के लिए भी होता है, और मनुष्य से प्राकृति के लिए भी होता है।
इसलिए प्रधानता के इस दौड़ में मनुष्य नायक है इसमें कोई दो राय नहीं है। क्योंकि प्रेम की प्रकाष्ठा को सबसे ज्यादा समझने वाला इस पृथ्वी पर कोई जीव है तो वह है मानव, जो प्रेम को पहले परखता है उसके बाद महसूस करता है, उसके बाद प्रेम करने लगता है। और उसके बाद सामने वाले से बिना कहे, ये स्वयं में उसको आभास होने लगता है कि "मेरे अंदर तु, तेरे अंदर मैं" यही स्थिति मनुष्य का ईश्वर के साथ भी होता है जो मनुष्य के आपार त्याग और समर्पण से मनुष्य के अंदर यह घर कर जाता है कि ईश्वर मेरे अंदर ही है और मैं उनके अंदर हु अर्थात मैं भी ईश्वर का रूप ही हु, बशर्ते मैं अपने स्वभाव से उनके गुणों को अपने अंदर सम्मिलित कर लू तो और यही कारण है कि शायद धीर धीर मैं अपने आप में यह बदलाव ला रहा हूं ।
इसलिए स्वयं को ईश्वर के प्रति समर्पित करते हुए ऐसा महसूस हो रहा है कि "मेरे अंदर ईश्वर और उनके अंदर मैं हु" इसी आपार संभावनाओं के बीच मैं अपने प्रेम अनुराग को अटूट आस्था का रूप देता हु जिससे मैं अनुरागीत होते हुए खुश, प्रसन्नचित रहता हूं और दूसरों को भी सह्रदय प्रेम दीप जलने के लिए प्रेरित करता हूं।
सप्रेम धन्यवाद
🙏❤️🌹🎉

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