किनारों का भरोसा क्या, किनारे छूट जाते हैं। नौचंदी मेले में संपन्न हुआ भव्य राष्ट्रीय कवि सम्मेलन
मेरठ — प्रांतीयकृत नौचंदी मेला समिति के तत्वावधान में आयोजित राष्ट्रीय कवि सम्मेलन आज पटेल मंडप, नौचंदी मेला परिसर में अपने भव्य स्वरूप में संपन्न हुआ। सर्वप्रथम आचार्य महामंडलेश्वर पूज्य स्वामी श्री प्रेमानंद पुरी जी महाराज, मुख्य अतिथि माननीय आचार्य राधाकृष्ण मनोडी जी केंद्रीय मंत्री विश्व हिंदू परिषद एवं उपस्थित सम्माननीय अतिथियों ने दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया।
कार्यक्रम की संयोजिका कवयित्री तुषा शर्मा ने सभी माननीय अतिथियों तथा कवियों को मंच पर सुशोभित होने का आग्रह किया। मंचासीन अतिथियों के स्वागत परिचय के पश्चात कवयित्री तुषा शर्मा ने "उज्जवल उज्जवल धवला धवला हे कल्याणी, जय जय हो माँ सरस्वती" वंदना प्रस्तुत की।
इसके पश्चात क्रम से कवियों ने काव्य पाठ प्रारंभ किया, जिसमें सर्वप्रथम दिल्ली से पधारे हास्य एवं व्यंग्यकार श्री शंभू शिखर ने अपनी रचना में कहा — "मनहूस से चेहरों को सदा डाँटता हूँ मैं, ग़म की बदलियों में भी ख़ुशी छाँटता हूँ मैं, अच्छा नहीं लगता मुझे चेहरा उदास सा, बस इसलिए ही सबको हँसी बाँटता हूँ मैं।"
इटावा से पधारे ओज के कवि श्री कमलेश शर्मा ने कहा — "जतन से संवारी कलम बोलती है, कि बनकर दुधारी कलम बोलती है, जहाँ लोग अन्याय पर मौन रहते, वहाँ पर हमारी कलम बोलती है।"
प्रयागराज से पधारे गीतकार एवं वरिष्ठ कवि प्रोफेसर श्लेष गौतम ने कहा — "पुरखों ने जो निभाई हमें चाहिए त्याग की वो कमाई हमें चाहिए, राम घर-घर में हों प्रार्थना है मगर, इक भरत जैसा भाई हमें चाहिए।"
ग्वालियर के गीतकार श्री राजुमार शर्मा ने कहा — "प्रश्न जीवन का मेरा सरल हो गया, मन ये पाषाण मेरा तरल हो गया, मैं समंदर का खारा मालिन नीर था, तुमको पाकर के मैं गंगा का जल हो गया।"
हास्य कवि आगरा निवासी श्री लटूरी लट्ठ ने श्रोताओं को हंसाते हुए कहा — "वो हिन्दी के बल सारी दुनिया डोल लेता है। अंग्रेजी तो पौआ पीकर भी बोल लेता है। ना जाने क्यों इतनी मिठास है अपनी भाषा में, क्या बोलने से पहले मिश्री घोल लेता है।"
श्रृंगार की कवयित्री प्रतापगढ़ से सुश्री साक्षी तिवारी ने जहाँ युगधर्मिता के स्वरूप की चर्चा की, वहीं लखनऊ के गीतकार लोकेश त्रिपाठी ने वर्तमान विसंगतियों से श्रोताओं को अवगत कराया। ओज के कवि श्री विष्णु उपाध्याय फिरोजाबाद ने कहा — "सुध-बुध भूल गए रिश्ते घर आँगन के, ममता के द्वार को कपाट नहीं मिला है, इंच-इंच टुकड़ों में खोज रही माई, किंतु चूमने को लाल का ललाट नहीं मिला है।"
गीत और श्रृंगार की कवयित्री तुषा शर्मा ने क्रांति धरा मेरठ का परिचय देते हुए देश के शहीदों के नाम अपनी रचना समर्पित की — "जिस धरती ने आजादी का पहला शंख बजाया था, जिस पर नायक मंगल पांडे शोला बनकर आया था..." जिसे रसिक श्रोताओं ने तालियाँ बजाकर कवयित्री की रचनाओं को खूब सराहा।
इस अवसर पर राज्यसभा सदस्य सांसद डॉ. लक्ष्मीकांत वाजपेयी, कैबिनेट मंत्री उत्तर प्रदेश सरकार डॉ. सोमेंद्र तोमर, महापौर हरिकांत अहलूवालिया, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विभाग संघ चालक विनोद भारतीय, पंडित सुनील भराला, जगमोहन लाल डॉ जितेंद्र त्यागी मुनेश कुमार, सत्य प्रकाश अग्रवाल, प्रणव मनोडी, प्रकर्ष मनोडी, सुमनेश सुमन, विवेक शर्मा, नरेंद्र राष्ट्रवादी, राकेश गुप्ता, आलोक सिसोदिया, नासिर सैफी आर्यन राणा प्रिंस चौधरी अर्क सिंह आदि गणमान्य महानुभावों की उल्लेखनीय उपस्थिति रही।
वंदे मातरम् राष्ट्रगीत के पश्चात कार्यक्रम समाप्ति की घोषणा की गई।