शाहपुर पटोरी से ग्राउंड रिपोर्ट: जनवितरण प्रणाली का 'महाघोटाला' और कर्महीनता का चक्रव्यूह !
बिहार के समस्तीपुर जिले का एक शांत कस्बा—शाहपुर पटोरी। कहने को तो यह एक अनुमंडल है, जहां सरकार की कल्याणकारी योजनाएं कागजों पर सरपट दौड़ रही हैं। लेकिन जब आप पटोरी अनुमंडल के तीनों ब्लॉकों के गांवों, गलियों और जनवितरण प्रणाली (PDS) की दुकानों का रुख करते हैं, तो 'खाद्य सुरक्षा' के नाम पर चल रहे एक ऐसे महाघोटाले का सच सामने आता है, जो देश की रीढ़ को अंदर ही अंदर खोखला कर रहा है। यह सच किसी एयर-कंडीशनर कमरे में बैठे अर्थशास्त्री का नहीं, बल्कि जमीन पर मुस्तैद डीलरों और ठगे जा रहे उपभोक्ताओं की आपबीती है।
सुरक्षा कारणों से नाम न छापने की शर्त पर पटोरी के स्थानीय डीलरों ने जो बयां किया, वह चौंकाने वाला है। आज तकनीक (POS Machine) आने के बाद भी भ्रष्टाचार रुका नहीं है, बल्कि उसने अपना तरीका बदल लिया है।
प्रति क्विंटल की घूस: डीलरों का दर्द है कि उन्हें अनाज की नापी में पहले ही कम अनाज मिलता है। ऊपर से हर क्विंटल पर 22 से 25 रुपये की बंधी-बंधाई राशि एम.ओ. (Marketing Officer) की जेब में जाती है। जिन डीलरों के पास धनबल और बाहुबल है, वे शायद कुछ रियायत पा जाते हैं, लेकिन छोटे और ईमानदार डीलर इस चक्की में पिस रहे हैं।
ऑडिट और औचक निरीक्षण का 'टैक्स': कहानी यहीं खत्म नहीं होती। हर तीन महीने में 1700 रुपये 'ऑडिट' के नाम पर सरकारी बाबुओं को देने पड़ते हैं। यदि कोई बड़ा अधिकारी 'औचक निरीक्षण' पर आ जाए, तो उसके 'शाही स्वागत' और विदाई का पूरा खर्च डीलर को अपनी जेब से उठाना पड़ता है। हो सकता है ये घुस की राशि डीलर के अपने सूझ बूझ से कम या ज्यादा हो सकता है या कहीं कभी ताकत से भी ।
POS मशीन का दर्द: डीलरों का कहना है कि पहले जब पीओएस मशीन नहीं थी, तो कुछ बचत हो जाती थी और ऊपर देना अखरता नहीं था। अब 'वन नेशन वन राशन कार्ड' से उपभोक्ता कहीं भी जाने के लिए स्वतंत्र हैं, जिससे कई जगह डीलरों की बिक्री घटी है, लेकिन ऊपर जाने वाला 'कमीशन' जस का तस है।
इस पूरी व्यवस्था का सबसे काला सच यह है कि वास्तविक गरीब आज भी दाने-दाने को मोहताज है, जबकि संपन्न लोग इस बहती गंगा में हाथ धो रहे हैं।यदि निष्पक्ष जांच कराई जाए, तो पटोरी सहित पूरे बिहार में लगभग 75% उपभोक्ता ऐसे मिलेंगे जो इस मुफ्त के अनाज के हकदार ही नहीं हैं।
उंगलियों का खेल और कमीशन का मेल: पटोरी के गांवों में यह आम नजारा है कि बड़े-बड़े जमीन वाले, पक्के मकान वाले और आर्थिक रूप से संपन्न लोग डीलर की दुकान पर अनाज लेने नहीं जाते। डीलर खुद पीओएस (POS) मशीन लेकर उनके दरवाजे पहुंचता है। अमीर उपभोक्ता सिर्फ मशीन पर अपना अंगूठा (Fingerprint) लगाता है और डीलर बाजार भाव के हिसाब से अनाज की तय कीमत नगद रूप में उसके हाथ में थमा देता है। अनाज डीलर के पास ही रह जाता है, जिसे वह खुले बाजार में ऊंचे दामों पर बेच देता है। उसकी मजबूरी ये है कि उसी पैसों में से वो बाबुओं को भी पैसा देता है । बीच में एक ईमानदार IAS अधिकारी पटोरी में SDO के पद पर आए उन्होंने अपने कुछ महीनों के कार्यकाल में इस पूरे घपले पर बहुत हद तक रोक लगा दी , लेकिन दुर्भाग्य है कि वो पटोरी में उनको रुकने ही नहीं दिया गया । बहुत लोगों को दिक्कत होने लगी ।
वहीं, कुछ बड़े परिवारों को जरूरत से ज्यादा राशन मिल रहा है। वे इस सरकारी मोटे अनाज को उठाते हैं, बाजार में बनियों को बेचते हैं और उस पैसे से अपने लिए 'कीमती' (महीन) चावल-गेहूं खरीदते हैं। यह टैक्सपेयर्स के पैसे का सबसे बड़ा मजाक है।
यह महाघोटाला सिर्फ निचले स्तर पर नहीं है। इसमें एफसीआई (FCI) गोदाम के अदना कर्मचारी से लेकर बड़े अधिकारी और सफेदपोश नेता तक शामिल हैं। देश के नीति-नियंताओं को इस जमीनी हकीकत का पूरा इल्म है। उन्हें पता है कि जनता को बुनियादी सुविधाएं—जैसे शिक्षा, उद्योग और रोजगार—देने के बजाय पांच साल में एक बार 'मुफ्त राशन' का दाना फेंककर सत्ता की कुर्सी हासिल की जा सकती है।
तभी तो चुनावी मंचों से बड़े गर्व से देश के प्रधानमंत्री जी द्वारा घोषणाएं होती हैं: "आप लोगों को उषना (उबला) चावल पसंद है न? हम आपको वही चावल देंगे।"
यह बयान इस बात का प्रमाण है कि सरकारें जनता को आत्मनिर्भर नहीं, बल्कि 'याचक' बनाए रखना चाहती हैं। वर्ल्ड बैंक (World Bank) और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से कर्ज लेकर देश पर कर्ज का बोझ बढ़ाया जा रहा है, ताकि पांच साल तक जनता बुनियादी जरूरतों के लिए रोती-बिलखती रहे और चुनाव आते ही "मुफ्त की रेवड़ियों" पर अपना वोट बेच दे।
मुफ्त के इस अनाज ने बिहार जैसे गरीब राज्य के श्रम-संस्कृति पर सबसे गहरा प्रहार किया है। मुफ्त का राशन पाकर स्थानीय स्तर पर लोग 'कर्महीन' हो रहे हैं।
पटोरी और आस-पास के गांवों का एक अजीब अंतर्विरोध देखिए:
खेतों में मजदूर नहीं: स्थानीय किसानों को अपनी फसल काटने या बुआई के लिए मजदूर नहीं मिलते। मजदूरों को लगता है कि जब खाने भर का अनाज मुफ्त मिल ही रहा है, तो गांव में धूप में पसीना क्यों बहाएं? स्थानीय स्तर पर काम करने में उन्हें 'शर्म' महसूस होती है। नतीजा यह है कि खेती की लागत बढ़ गई है और छोटे किसानों का खेती से मोहभंग हो रहा है।
"जनसेवा एक्सप्रेस" का नारकीय सच यही है ये वही मजदूर हैं जो अपने गांव-जवार में स्वाभिमान से काम नहीं करना चाहता, वह पटोरी स्टेशन से गुजरने वाली "जनसेवा एक्सप्रेस" में सवार होता है। ट्रेन की बोगियों में इंसानों को जानवरों से भी बदतर स्थिति में, मालगाड़ी के सामान की तरह ठूस-ठूस कर लादा जाता है। और ये मजदूर लुधियाना, पंजाब या दिल्ली की फैक्ट्रियों में जाकर हाड़-तोड़ मजदूरी करते हैं। अपने राज्य में मुफ्त का राशन उठाना और दूसरे राज्यों में जाकर अपमानजनक स्थितियों में मजदूरी करना—यह बिहार की नियति बन चुकी है।
शाहपुर पटोरी के एक छोटे से कोने से दिख रही यह तस्वीर पूरे बिहार और देश के भविष्य का आईना है। मुफ्त अनाज की यह व्यवस्था देश की अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ रही है। यह शॉर्ट-टर्म वोट बैंक का लालच लॉन्ग-टर्म में देश को दिवालियापन की ओर धकेल रहा है।
एक लेखक के रूप में हमारी कलम तब तक नहीं रुकनी चाहिए, जब तक कि यह मूक और सजग भारत इस चक्रव्यूह के खिलाफ खड़ा न हो जाए। सरकार को मुफ्त अनाज की नीति की समीक्षा करनी होगी; अपात्रों के नाम काटने होंगे और अनाज के बदले 'रोजगार और उद्योग' की व्यवस्था करनी होगी। वरना, 'जनसेवा एक्सप्रेस' में ठसाठस भरी वो बेबस जनता और पटोरी के खेतों में सड़ती फसलें इस बात की गवाह रहेंगी कि हमने एक पूरी पीढ़ी को मुफ्तखोरी के नाम पर अपाहिज बना दिया।
मनीष सिंह
शाहपुर पटोरी
@ManishSingh_PT