ब्रह्म वन से पर्यावरण चेतना का शंखनाद:
गया में विश्व पर्यावरण दिवस 2026 का गहरा संदेश,
विजय कुमार, वरिष्ठ पत्रकार
गया, बिहार: 5 जून 2026 को विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर गया वन प्रमंडल द्वारा गया के ऐतिहासिक 'ब्रह्म वन' में एक भव्य और प्रेरणादायी कार्यक्रम का आयोजन किया गया।
मुख्य अतिथि:
बिहार विधानसभा के माननीय अध्यक्ष डॉ. प्रेम कुमार रहे, जिन्होंने स्वयं पौधे लगाकर इस अभियान की शुरुआत की।
अध्यक्षता:
गया वन प्रमंडल के वन प्रमंडल पदाधिकारी (DFO) श्री शशिकांत कुमार ने की।
सहभागिता:
इस कार्यक्रम में जिले के गणमान्य नागरिक, जनप्रप्रतिनिधि, ब्रह्माकुमारी संस्थान की बहनें, सामाजिक कार्यकर्ता, विद्यार्थी, स्थानीय जैव विविधता समिति के सदस्य और पर्यावरण प्रेमी भारी उत्साह के साथ शामिल हुए।
मूल उद्देश्य:
पर्यावरण संरक्षण और प्रकृति संवर्धन के प्रति जन-जागरूकता को जमीनी स्तर पर बढ़ाना।
प्रतीकात्मकता से परे:
नीति और नेतृत्व का समन्वय,
बिहार विधानसभा के अध्यक्ष डॉ. प्रेम कुमार की इस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थिति यह दर्शाती है कि पर्यावरण का मुद्दा अब केवल प्रशासनिक गलियारों या एनजीओ तक सीमित नहीं है, बल्कि यह राज्य के नीति-निर्माण के शीर्ष स्तर पर अपनी जगह बना चुका है।
जब राजनीतिक नेतृत्व खुद कुदाल और पौधा थामकर जमीन पर उतरता है, तो इसका संदेश सीधे आम जनता तक जाता है।
गया और 'ब्रह्म वन' का पारिस्थितिकीय महत्व,
गया की भूमि ऐतिहासिक और आध्यात्मिक रूप से अत्यंत समृद्ध है, लेकिन पिछले कुछ दशकों में दक्षिण बिहार के इस क्षेत्र ने भीषण गर्मी, लू और गिरते भूजल स्तर की गंभीर चुनौतियों का सामना किया है।
ऐसे में 'ब्रह्म वन' जैसे पारंपरिक और प्राकृतिक क्षेत्रों को पुनर्जीवित करना और वहां सघन वृक्षारोपण करना गया के स्थानीय इकोसिस्टम के लिए संजीवनी का काम करेगा।
यह न केवल हरित आवरण को बढ़ाएगा बल्कि जैव विविधता को भी संरक्षित करेगा।
सर्वसमावेशी मॉडल:
सामाजिक और आध्यात्मिक सहकारिता,
इस कार्यक्रम की सबसे बड़ी ताकत इसकी विविधता पूर्ण भागीदारी है।
ब्रह्माकुमारी संस्थान जैसी आध्यात्मिक संस्थाओं की बहनों की उपस्थिति यह रेखांकित करती है कि प्रकृति का संरक्षण हमारे आंतरिक और सांस्कृतिक मूल्यों से जुड़ा है।
वहीं, स्थानीय जैव विविधता समिति और विद्यार्थियों को शामिल करना यह सुनिश्चित करता है कि यह अभियान वैज्ञानिक दृष्टिकोण से सही दिशा में बढ़े और आने वाली पीढ़ी में पर्यावरण के प्रति जवाबदेही पैदा हो।
3. भविष्य की राह और संस्तुतियां
ऐसे भव्य आयोजनों की सफलता केवल इस बात से नहीं आंकी जानी चाहिए कि उस दिन कितने पौधे लगे, बल्कि इस बात से आंकी जानी चाहिए कि उनमें से कितने पौधे जीवित बचे।
वन विभाग और गया प्रशासन को निम्नलिखित रणनीतियों पर काम करना होगा:
पौधों की उत्तरजीविता : डीएफओ श्री शशिकांत कुमार के नेतृत्व में वन विभाग को रोपे गए पौधों की सुरक्षा के लिए 'ट्री-गार्ड' और नियमित सिंचाई की व्यवस्था करनी होगी। अगले छह महीने इन पौधों के अस्तित्व के लिए सबसे महत्वपूर्ण हैं।
विद्यार्थियों को 'पर्यावरण दूत' बनाना:
कार्यक्रम में शामिल छात्रों को केवल दर्शक न बनाकर उन्हें इन पौधों की जिम्मेदारी सौंपी जानी चाहिए (जैसे: "एक छात्र - एक पेड़" नीति)।
शहरी वानिकी को बढ़ावा:
ब्रह्म वन के इस सफल मॉडल को गया के अन्य कस्बों और अर्ध-शहरी अंचलों में भी एक जन-आंदोलन के रूप में विस्तारित किया जाना चाहिए।
निष्कर्ष :
गया के ब्रह्म वन से उठी यह पर्यावरण चेतना केवल एक दिन की रस्म अदायगी नहीं बल्कि भविष्य के संकटों से निपटने का एक ठोस संकल्प पत्र है।
वन विभाग की यह पहल सराहनीय है, लेकिन अब समय आ गया है कि समाज का हर नागरिक 'प्रकृति संवर्धन' को अपने दैनिक जीवन के आचार-विचार में शामिल करे। यदि यह जन-भागीदारी सतत बनी रही, तो गया न केवल आध्यात्मिक रूप से बल्कि पर्यावरणीय रूप से भी देश के लिए एक आदर्श मॉडल प्रस्तुत करेगा।