सहारियन का सवाल देश के रहनुमाओं से :- लोकतंत्र की सबसे बड़ी परीक्षा:- जब सहारा का निवेशक पूछे जिम्मेदारी किसकी"?*
लोकतंत्र केवल वोट डालने से नहीं चलता। लोकतंत्र तब मजबूत होता है जब हर स्तर पर जवाबदेही होती है। लेकिन आज सहारा-सेबी मामला हमें आईना दिखा रहा है कि जब गलती सबकी है, तो जिम्मेदारी किसी की नहीं रह जाती।
*1. देश छोटे-छोटे मुद्दों पर बयान आते हैं, सहारा में पैसे फंसे तो “प्रक्रिया चल रही है”*
कहीं कोई घटना होती है तो सरकार विपक्ष को दोष देती है, विपक्ष सरकार को। ठीक यही खेल 14 साल से सहारा के निवेशक देख रहे हैं।
- सेबी कहता है:- पैसा हमारे पास है, कोर्ट के आदेश से बंटेगा।
- ईडी कहता है:- यह अपराध से जुड़ी संपत्ति है, पहले जांच पूरी हो।
- सहारा कहता है:- हमारा पैसा गलत तरीके से फंसाया गया।
- सरकार कहती है:- कानून अपना काम कर रहा है।
नतीजा? निवेशक बीच में फंसा। उसकी गलती क्या थी – कि उसने “भारत के लोग” बनकर देश में वर्षों से स्थापित स्वदेशी विश्वसनीय और बड़ी कंपनी में भरोसा किया?
*2. “सबका साथ, सबका विकास” का हिसाब कौन देगा?*
लोकतंत्र में नेता अपने वादों का हिसाब दें, अधिकारी अपने फैसलों का, संस्था अपनी जिम्मेदारियों का। सहारा ने ब्याज सहित ₹25,000 करोड़ से ज्यादा जमा है, पर ₹10 लाख वाले निवेशक को ₹50,000 देकर कहा जाता है – “पोर्टल पर अप्लाई करो”।
क्या ये जवाबदेही है? या छवि बचाने की सफाई? जब काम से ज्यादा फिजूल मुद्दे जरूरी हो जाए, तो लोकतंत्र भीतर से खोखला होने लगता है।
*3. हम असफलताओं के आदी हो गए हैं*
देश के अंदर कोई भी घटना होने पर 3 दिन शोर, फिर अगला मुद्दा। सहारा में भी यही हुआ। 2012 में सुप्रीम कोर्ट का आदेश, 2023 में ₹5,000 करोड़ देने की अनुमति, 2026 तक का समय। हर तारीख के बाद नया बयान, पर निवेशक की फाइल वहीं की वहीं।
न जांच का निष्कर्ष याद रहता है, न वादों का हिसाब। क्योंकि गलती मानना कमजोरी मान ली गई है।
*4. कुर्सी सम्मान नहीं, जिम्मेदारी है*
सहारा मामला बताता है कि जब पद केवल शक्ति का प्रतीक बन जाए और जिम्मेदारी का नहीं, तब लोकतंत्र का स्तर गिरता है। निवेशक आज ये नहीं पूछ रहा कि दोषी कौन है – वो ये पूछ रहा है कि मेरा पैसा कौन और कब तक लौटाएगा?
*निष्कर्ष:-*
सहारा का निवेशक भी “हम भारत के लोग” का हिस्सा है। लोकतंत्र की हत्या हमेशा हथियारों से नहीं होती। कई बार वो तब मरने लगती है जब सवाल पूछना अपराध लगे, जब जवाब देना जरूरी न रहे, और जब जनता भी परिणाम के बजाय नारों से खुश होने लगे।
आज जरूरत केवल अच्छे नेताओं की नहीं, अच्छे नागरिकों की भी है – जो ताली बजाने से पहले हिसाब मांगें। क्योंकि लोकतंत्र की असली रक्षा संविधान की किताब नहीं, जागरूक नागरिक करते हैं।
और जिस देश में हर कोई अधिकार मांगे, पर जिम्मेदारी लेने को कोई तैयार न हो – वहां लोकतंत्र धीरे-धीरे भीड़तंत्र बन जाता है। भीड़तंत्र में शोर बहुत होता है, पर सहारा के निवेशक की तरह आम आदमी का सवाल कहीं खो जाता है। सबका हिसाब होगा
जितना खुद सहन कर पाओ किसी पर उतना ही जुल्म करना। जितना नुकसान आप खुद उठा पाओ उतना ही छल कपट लोगों के साथ करना जितनी बेइज्जती तुम सहन कर पाओ उतना ही लोगों की इज्जत से खेलना क्योंकि जब ये प्रकृति हिसाब करेगी उस दिन खून के आंसू रुला देगी।
ऊपर वाले के घर देर है अंधेर बिल्कुल भी नहीं है अति के बाद क्षति निश्चित है।
इससे कोई नहीं बच पाया चाहे रावण हो या दुर्योधन सब खाक में मिल गए? धन्यवाद! सादर सहारा प्रणाम!🙏🏼
*लेखक आभार:- APS परिहार, सहारा इंडिया, मध्य प्रदेश*