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अहिल्याबाई होलकर जयंती श्रद्धांजलि या राजनीतिक औपचारिकता?

अहिल्याबाई होलकर जयंती — श्रद्धांजलि या राजनीतिक औपचारिकता?

हर वर्ष बड़े उत्साह और राजनीतिक रंग-रूप के साथ अहिल्याबाई होलकर की जयंती मनाई जाती है। मंच सजते हैं, माल्यार्पण होता है, भाषणों की गूंज उठती है। लेकिन एक गंभीर प्रश्न समाज के सामने खड़ा होता है—क्या यह आयोजन उनके आदर्शों का अनुसरण है, या केवल एक औपचारिक राजनीतिक परंपरा बनकर रह गया है?

अहिल्याबाई होलकर केवल एक शासक नहीं थीं, वे लोककल्याण की प्रतिमूर्ति थीं। उन्होंने अपने शासनकाल में धर्म, समाज और न्याय के बीच अद्भुत संतुलन स्थापित किया। काशी से लेकर सोमनाथ तक मंदिरों का पुनर्निर्माण, यात्रियों के लिए धर्मशालाएं, गरीबों के लिए कुएं और सड़कों का निर्माण—ये सब उनके शासन की पहचान थे। आज जब राजनीतिक दल उनके नाम पर कार्यक्रम करते हैं, तो यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि वे भी उसी प्रकार के जनकल्याणकारी कार्यों को प्राथमिकता दें।

दुर्भाग्य से आज की राजनीति में यह दृष्टिकोण कम ही दिखाई देता है। जयंती समारोहों में भीड़ जुटाना आसान है, लेकिन शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसे मूलभूत मुद्दों पर ठोस काम करना कठिन। क्या यही अहिल्याबाई के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है?

अहिल्याबाई का जीवन सादगी, ईमानदारी और पारदर्शिता का प्रतीक था। उन्होंने राजकोष को जनता की अमानत समझा, निजी विलासिता के लिए नहीं। आज जब भ्रष्टाचार और अपारदर्शिता के आरोप राजनीतिक व्यवस्था पर लगातार लगते हैं, तब यह और भी आवश्यक हो जाता है कि उनके नाम का उपयोग करने वाले दल स्वयं को उनके आदर्शों के अनुरूप ढालें।

महिला सशक्तिकरण के संदर्भ में भी अहिल्याबाई एक अद्वितीय उदाहरण हैं। उन्होंने उस समय शासन संभाला जब महिलाओं की भूमिका सीमित थी। आज के राजनीतिक दल यदि वास्तव में उनके विचारों का सम्मान करते हैं, तो उन्हें महिलाओं को केवल प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि वास्तविक नेतृत्व में स्थान देना होगा।

साथ ही, अहिल्याबाई ने समाज को जोड़ने का कार्य किया, न कि विभाजित करने का। उनकी नीतियां धार्मिक सहिष्णुता और सामाजिक समरसता पर आधारित थीं। वर्तमान समय में जब समाज में विभाजन की प्रवृत्ति बढ़ती दिखती है, तब उनके आदर्श और भी प्रासंगिक हो जाते हैं।

यह समय आत्ममंथन का है। क्या हम अहिल्याबाई होलकर को केवल एक ऐतिहासिक व्यक्तित्व मानकर उनकी जयंती मनाते रहेंगे, या उनके सिद्धांतों को अपने आचरण और नीतियों में उतारेंगे? राजनीतिक दलों के लिए यह एक अवसर है—वे यह सिद्ध करें कि उनके लिए अहिल्याबाई केवल एक नाम नहीं, बल्कि एक मार्गदर्शक विचारधारा हैं।

अंततः, सच्ची श्रद्धांजलि वही होगी, जब जयंती के मंच से निकले शब्द धरातल पर कार्य के रूप में दिखाई दें। जब सत्ता सेवा का माध्यम बने, जब समाज में समरसता बढ़े, और जब हर निर्णय में जनहित सर्वोपरि हो—तभी हम कह सकेंगे कि हमने अहिल्याबाई होलकर के आदर्शों को सही मायनों में अपनाया है।

— संपादकीय मंडल

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