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दिल्ली हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: 2005 से पहले पिता की मृत्यु होने पर कृषि भूमि में बेटी नहीं मांग सकती हिस्सा


📰 AIMA MEDIA | विशेष कानूनी रिपोर्ट

दिल्ली हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: 2005 से पहले पिता की मृत्यु होने पर कृषि भूमि में बेटी नहीं मांग सकती हिस्सा

नई दिल्ली | 1 जून 2026

दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि किसी व्यक्ति की मृत्यु 9 सितंबर 2005 से पहले हो गई थी, तो उसकी कृषि भूमि के उत्तराधिकार का निर्धारण उस समय लागू कानूनों के अनुसार होगा। ऐसे मामलों में बेटी कृषि भूमि में हिस्सेदारी का दावा नहीं कर सकती, यदि उस समय लागू कानून में पुरुष उत्तराधिकारियों को प्राथमिकता दी गई थी।

न्यायमूर्ति मिनी पुष्कर्णा की पीठ ने संत्रा देवी बनाम संतोष कौशिक एवं अन्य मामले में यह फैसला सुनाते हुए विभाजन (Partition) संबंधी वाद को खारिज कर दिया।

क्या था मामला?

याचिकाकर्ता संत्रा देवी ने दिल्ली के सिरसपुर गांव स्थित कृषि भूमि में अपना हिस्सा मांगते हुए 2024 में दीवानी वाद दायर किया था। उनका दावा था कि वह अपने पिता स्वर्गीय ब्रह्म दत्त की कानूनी उत्तराधिकारी हैं और उन्हें भी संपत्ति में बराबर का हिस्सा मिलना चाहिए।

ब्रह्म दत्त का निधन वर्ष 2002 में हुआ था। उनके पीछे दो पुत्र और दो पुत्रियां थीं। मृत्यु के बाद कृषि भूमि की भूमिधारी (Bhumidari) अधिकारों का नामांतरण दोनों पुत्रों के नाम कर दिया गया था।

अदालत ने क्या कहा?

हाईकोर्ट ने कहा कि जब ब्रह्म दत्त की मृत्यु हुई, उस समय दिल्ली भूमि सुधार अधिनियम, 1954 (Delhi Land Reforms Act, 1954) लागू था।

इस कानून की धारा 50 के अनुसार कृषि भूमि का उत्तराधिकार मुख्य रूप से पुरुष वंशजों को प्राप्त होता था। इसलिए उस समय बेटियों को कृषि भूमि में उत्तराधिकार का अधिकार प्राप्त नहीं था।

अदालत ने स्पष्ट किया कि:
> "उत्तराधिकार जिस तारीख को खुलता है, उसी तारीख को लागू कानून के अनुसार अधिकार निर्धारित होते हैं।"


इसलिए 2002 में खुला उत्तराधिकार 2005 के संशोधित हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम से प्रभावित नहीं होगा।

2005 संशोधन क्यों नहीं मिला लाभ?

वर्ष 2005 में हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम में बड़ा संशोधन किया गया था, जिसके बाद बेटियों को पुत्रों के समान पैतृक संपत्ति में अधिकार मिला।

लेकिन हाईकोर्ट ने कहा कि यह संशोधन पूर्व प्रभाव (Retrospective Effect) से लागू नहीं होगा। यदि पिता की मृत्यु 9 सितंबर 2005 से पहले हो चुकी है, तो उस समय के कानून के अनुसार ही अधिकार तय होंगे।

HUF का दावा भी खारिज

याचिकाकर्ता ने यह भी तर्क दिया कि भूमि हिंदू अविभाजित परिवार (HUF) की संपत्ति थी।

अदालत ने पाया कि इस दावे के समर्थन में कोई दस्तावेज़, रिकॉर्ड या ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया। केवल सामान्य दावा करने से HUF साबित नहीं होता।

इसी आधार पर अदालत ने कहा कि याचिका वास्तविक कारण-ए-कार्यवाही (Cause of Action) प्रस्तुत करने में असफल रही।

अदालत का अंतिम निर्णय

दिल्ली हाईकोर्ट ने प्रतिवादियों की Order VII Rule 11 CPC के तहत दायर याचिका स्वीकार करते हुए:
✅ संत्रा देवी का वाद खारिज किया।
✅ सभी लंबित आवेदन भी निस्तारित कर दिए।

फैसले का व्यापक प्रभाव
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय उन हजारों मामलों को प्रभावित कर सकता है जिनमें:
कृषि भूमि का उत्तराधिकार 2005 से पहले खुला था।
बेटियां बाद में हिस्सा मांगने के लिए अदालत पहुंच रही हैं।
दिल्ली भूमि सुधार अधिनियम जैसे विशेष भूमि कानून लागू हैं।

यह फैसला स्पष्ट करता है कि 2005 संशोधन के बाद बेटियों को व्यापक अधिकार मिले हैं, लेकिन पुराने उत्तराधिकार मामलों में उस संशोधन का लाभ स्वतः नहीं मिलेगा।
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📌 केस विवरण
मामला: Santra Devi vs Santosh Kaushik & Others
केस संख्या: CS(OS) 188/2024
न्यायाधीश: Justice Mini Pushkarna
निर्णय तिथि: 30 मई 2026
न्यायालय: Delhi High Court

✍️ रिपोर्ट: सुजीत शुक्ला
News Editor | AIMA MEDIA

सरल भाषा में समझें

यदि पिता की मृत्यु 9 सितंबर 2005 के बाद हुई है, तो बेटी को सामान्यतः पुत्र के बराबर अधिकार मिल सकते हैं।

यदि पिता की मृत्यु 9 सितंबर 2005 से पहले हुई थी और मामला कृषि भूमि का है, तो उस समय लागू राज्य/भूमि कानून प्रभावी रह सकते हैं।

हर मामले के तथ्य अलग होते हैं, इसलिए यह फैसला सभी संपत्ति विवादों पर समान रूप से लागू नहीं माना जाएगा।

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