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कर्मचारियों की मनमानी: जांच फॉर्म में 'ऑब्लिक' का विकल्प होने पर भी लाचार माँ पर अतिरिक्त हस्ताक्षरों का दबाव

​विकासनगर (पछवादूं)। सरकारी दफ्तरों में नियमों की मनमानी व्याख्या और प्रशासनिक पटल पर तैनात कर्मचारियों की हीला-हवाली किस कदर आम जनता पर भारी पड़ती है, इसका एक ज्वलंत उदाहरण विकासनगर ब्लॉक में देखने को मिला है। यहाँ सोनिया देवी नामक एक बेबस महिला अपने एक पुत्र और तीन पुत्रियों के विलंबित जन्म पंजीकरण (Delayed Registration) की प्रक्रिया को पूरा कराने के लिए पिछले कई महीनों से ब्लॉक मुख्यालय के चक्कर काटने को मजबूर है। हैरान करने वाली बात यह है कि पटल पर बैठे जिम्मेदार कर्मचारियों द्वारा एक बार में कागजों की कमी नहीं बताई जाती, बल्कि हर बार चक्कर लगवाने के बाद एक नया कागजी रोड़ा अटका दिया जाता है। पारिवारिक पृष्ठभूमि के अनुसार, महिला के पति मानसिक रूप से पूरी तरह दिव्यांग हैं, जिसके कारण पूरे परिवार के भरण-पोषण सहित इस विधिक प्रक्रिया को पूरा करने की जिम्मेदारी अकेले सोनिया देवी (अभिभावक) के कंधों पर आ गई है।

​सारे विधिक और प्राथमिक साक्ष्य मौजूद होने के बावजूद, ब्लॉक के संबंधित जांच पटल पर बैठे कर्मचारी नियमों की आड़ में इस परेशान परिवार की चारों फाइलों को पेचीदा तकनीकी बहानों में उलझा रहे हैं।

​पूरा मामला ग्राम आदूवाला क्षेत्र का है। पीड़ित परिवार द्वारा अपने चारों बच्चों के विलंबित जन्म पंजीकरण के लिए उपजिलाधिकारी (SDM) न्यायालय विकासनगर से आदेश प्राप्त कर ब्लॉक में आवश्यक कार्यवाही शुरू कराई गई थी। इन फाइलों पर स्थानीय ग्राम प्रधान और वार्ड सदस्य की संस्तुति पहले ही लग चुकी है।

​इस मामले में सबसे बड़ा प्रशासनिक विरोधाभास और पटल की मनमानी तब उजागर हुई, जब जांच फॉर्म के तकनीकी प्रारूप को देखा गया। फॉर्म पर स्पष्ट रूप से "आंगनबाड़ी / ए.एन.एम. / आशा" का विकल्प (ऑब्लिक) अंकित है। प्रशासनिक और विधिक नियमों के तहत 'ऑब्लिक' का सीधा अर्थ है कि स्थानीय स्तर पर जन्म के सत्यापन के लिए इन तीनों में से किसी भी एक प्राधिकारी के हस्ताक्षर और मोहर पर्याप्त माने जाएंगे। वर्तमान फाइलों में क्षेत्र की आशा कार्यकर्ता (बाला देवी) के प्रामाणिक हस्ताक्षर और मोहर पहले से ही दर्ज हैं। इसके बावजूद, नियमों की मनमानी व्याख्या करते हुए पटल द्वारा अभिभावक पर अलग से अन्य विभागों के भी लिखित हस्ताक्षर लाने का मौखिक दबाव बनाया जा रहा है, जिससे महीनों से चल रही यह प्रक्रिया और अधिक लंबी खिंच रही है।

​राजस्व और शिक्षा विभाग के रिकॉर्ड के अनुसार अभिभावक द्वारा जमा की गई फाइलें कानूनी तौर पर पूरी तरह पुख्ता हैं। राजकीय पूर्व माध्यमिक विद्यालय, जुडली का आधिकारिक प्रगति पत्र और प्रधानाध्यापक का लिखित प्रमाण-पत्र फाइलों में संलग्न है, जो बच्चों की जन्मतिथि को प्रमाणित करता है। इसके साथ ही, तहसील कार्यालय से जारी प्रमाणित खतौनी और परिजनों के पहचान पत्र भी स्थाई निवासी होने के पुख्ता साक्ष्य के रूप में जुड़े हुए हैं। [Aadhaar Redacted]
​क्षेत्रीय जनता और स्थानीय ग्रामीणों का मानना है कि तत्कालीन जिलाधिकारी सविन बंसल के कार्यकाल में विभिन्न विभागों में औचक निरीक्षण कर अनियमितताओं पर सख्त कार्रवाई की गई थी, जिससे व्यवस्थाओं में सुधार दिख रहा था। उनके ट्रांसफर के बाद अब विकासनगर ब्लॉक के कुछ पटल सहायक और कर्मचारी पुनः बेलगाम होकर अपनी मनमानी पर उतारू हो गए हैं, जिससे जनता परेशान है।

​यह पूरी कार्यप्रणाली उत्तराखंड सेवा का अधिकार अधिनियम (Right to Service Act) की भावना के सर्वथा विपरीत है, जिसमें साफ कहा गया है कि यदि किसी फाइल पर किसी आंतरिक विभागीय क्रॉस-वेरिफिकेशन की आवश्यकता होती भी है, तो यह संबंधित जांच पटल का दायित्व है कि वह स्वयं शासकीय स्तर पर इसकी पुष्टि मांगे। लेकिन यहाँ खुद की जिम्मेदारी निभाने के बजाय, हर बार एक नई कमी निकालकर सीधे तौर पर नियमों की गलत व्याख्या करके एक लाचार महिला को परेशान किया जा रहा है।

​स्थानीय ग्रामीणों ने हाल ही में कलेक्ट्रेट परिसर का औचक निरीक्षण कर जनसमस्याओं के समयबद्ध निस्तारण और फाइलों के सुव्यवस्थित रखरखाव पर जोर देने वाले वर्तमान जिलाधिकारी डॉ. आशीष चौहान से अपील की है कि वे विकासनगर ब्लॉक का भी औचक निरीक्षण करें। जनता ने मांग की है कि नियमों की मनमानी व्याख्या करने वाले पटल की जवाबदेही तय की जाए और पीड़ित परिवार को जल्द से जल्द जन्म प्रमाण पत्र जारी किया जाए।

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