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गौरैया की वापसी की उम्मीद जगाती एक वर्दी की संवेदनशील मुहिम

गौरैया की वापसी की उम्मीद जगाती एक वर्दी की संवेदनशील मुहिम
▪️ गौरैया का घटता अस्तित्व बना चिंता का विषय

महेंद्रगढ़ (टीआर. राहुल कुमार) |
कभी भारतीय घर-आंगनों की पहचान मानी जाने वाली गौरैया आज धीरे-धीरे हमारी जिंदगी से गायब होती जा रही है। सुबह की शुरुआत जिस चहचहाहट से होती थी, वह अब शहरों और गांवों दोनों में कम सुनाई देने लगी है। बदलती जीवनशैली, शहरीकरण, पक्के मकानों का बढ़ता चलन, पेड़ों की कटाई और प्राकृतिक आवासों की कमी ने इस छोटी-सी चिड़िया के अस्तित्व को संकट में डाल दिया है। आधुनिकता की दौड़ में इंसान ने अपने लिए आलीशान मकान तो बना लिए, लेकिन उन पक्षियों के लिए जगह नहीं छोड़ी जो सदियों से हमारे जीवन और संस्कृति का हिस्सा रहे हैं। गौरैया केवल एक पक्षी नहीं, बल्कि भारतीय परिवेश, घरेलू संस्कृति और प्रकृति के संतुलन का प्रतीक रही है। ऐसे दौर में यदि कोई व्यक्ति व्यक्तिगत स्तर पर आगे बढ़कर प्रकृति और पक्षियों के संरक्षण का बीड़ा उठाता है, तो उसका प्रयास केवल एक सामाजिक कार्य नहीं बल्कि एक प्रेरणादायक आंदोलन बन जाता है।

हरियाणा पुलिस में कार्यरत कांस्टेबल शक्ति सिंह की मुहिम इसी संवेदनशील सोच और पर्यावरण प्रेम का जीवंत उदाहरण है। गांव दौंगड़ा अहीर निवासी शक्ति सिंह पिछले सात वर्षों से गौरैया संरक्षण के लिए निरंतर कार्य कर रहे हैं। वर्ष 2019 से उन्होंने कृत्रिम घोंसले बनाकर लोगों को निशुल्क वितरित करने की शुरुआत की थी, जो आज एक बड़े जन-जागरूकता अभियान का रूप ले चुकी है। उनकी इस पहल का उद्देश्य केवल घोंसले बनाना नहीं, बल्कि समाज को यह संदेश देना भी है कि प्रकृति और पक्षियों के प्रति हमारी जिम्मेदारी अभी समाप्त नहीं हुई है।

आज जबकि अधिकतर लोग अपने व्यस्त जीवन में पर्यावरण के मुद्दों को नजरअंदाज कर देते हैं, वहीं शक्ति सिंह अपनी पुलिस ड्यूटी के साथ-साथ समय निकालकर गौरैया के लिए घोंसले तैयार कर रहे हैं। अब तक वे लगभग 2500 से अधिक कृत्रिम घोंसले बनाकर विभिन्न गांवों, कस्बों और शहरों में वितरित कर चुके हैं। हर वर्ष वे 300 से 500 तक घोंसले तैयार करते हैं और कई बार यह संख्या 700 तक भी पहुंच जाती है। यह केवल मेहनत का नहीं बल्कि प्रकृति के प्रति उनके गहरे समर्पण, धैर्य और सेवा भाव का प्रमाण है।

विशेष बात यह है कि शक्ति सिंह इन घोंसलों को बाजार से खरीदी महंगी सामग्री से नहीं, बल्कि प्लाई, लकड़ी, जूतों के डिब्बों, प्लास्टिक की बड़ी बोतलों, पुराने मटकों और घरेलू उपयोग की अन्य वस्तुओं से तैयार करते हैं। यह पहल पर्यावरण संरक्षण का दूसरा संदेश भी देती है कि बेकार समझी जाने वाली वस्तुओं का उपयोग समाज और प्रकृति के हित में किया जा सकता है। वे केवल घोंसले वितरित नहीं करते, बल्कि लोगों को उन्हें घरों में लगाने, उनकी देखभाल करने और पक्षियों के लिए दाना-पानी रखने के लिए भी प्रेरित करते हैं। साथ ही वे लोगों को यह भी बताते हैं कि घरों में किस प्रकार सरल तरीके से कृत्रिम घोंसले बनाए जा सकते हैं।

दरअसल, गौरैया का संकट केवल एक पक्षी का संकट नहीं है, बल्कि यह पर्यावरणीय असंतुलन का संकेत भी है। वैज्ञानिक और पर्यावरणविद लंबे समय से इस बात को स्वीकार करते रहे हैं कि यदि छोटी चिड़ियों और जीवों की संख्या घटती है, तो यह प्रकृति के बिगड़ते संतुलन का स्पष्ट संकेत होता है। मोबाइल टावरों से निकलने वाली तरंगें, प्रदूषण, रासायनिक खेती और कंक्रीट के जंगलों ने गौरैया के प्राकृतिक जीवन को प्रभावित किया है। पहले घरों में रोशनदान, छज्जे, मिट्टी की दीवारें और खुले आंगन होते थे, जहां गौरैया आसानी से अपना घोंसला बना लेती थी। अब आधुनिक घरों की चिकनी दीवारों और बंद ढांचों में उसके लिए कोई सुरक्षित स्थान नहीं बचा।

ऐसे समय में शक्ति सिंह जैसे लोग उम्मीद की नई किरण बनकर सामने आए हैं। उनकी मुहिम की सबसे बड़ी सफलता यह है कि जिन घरों में उनके बनाए घोंसले लगाए गए हैं, वहां गौरैया ने फिर से अपना बसेरा बनाना शुरू कर दिया है। यह केवल एक सुखद दृश्य नहीं, बल्कि इस बात का प्रमाण है कि यदि समाज संवेदनशील हो जाए तो प्रकृति स्वयं लौटने लगती है। उनकी इस पहल ने लोगों में पर्यावरण के प्रति जागरूकता बढ़ाई है और अनेक युवा भी अब इस मुहिम से जुड़ने लगे हैं।

शक्ति सिंह के साथ गांव और आसपास के कई लोग भी इस अभियान में सहयोग कर रहे हैं। कोई घोंसले बनाने में मदद करता है तो कोई उन्हें गांव-गांव पहुंचाने में सहयोग देता है। सामाजिक सहभागिता की यही भावना किसी भी अभियान को मजबूत बनाती है। उनकी कार्यशाला में तैयार किए जा रहे सैकड़ों घोंसले यह संदेश देते हैं कि यदि इच्छा शक्ति मजबूत हो तो सीमित संसाधनों में भी बड़ा बदलाव संभव है।

समाज के विभिन्न वर्गों द्वारा इस कार्य की सराहना की जा रही है। पर्यावरण प्रेमियों और सामाजिक संगठनों का मानना है कि यह पहल आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणास्रोत है। वास्तव में ऐसे प्रयास यह साबित करते हैं कि परिवर्तन केवल बड़ी योजनाओं और सरकारी घोषणाओं से नहीं आता, बल्कि व्यक्तिगत स्तर पर किए गए छोटे-छोटे कार्य भी समाज में बड़ा बदलाव ला सकते हैं।

आज आवश्यकता इस बात की है कि हम भी अपने स्तर पर प्रकृति संरक्षण के लिए छोटे कदम उठाएं। यदि हर घर में एक घोंसला लगाया जाए, पक्षियों के लिए दाना-पानी रखा जाए और पेड़-पौधों को बचाने का संकल्प लिया जाए, तो वह दिन दूर नहीं जब गौरैया फिर से हमारे आंगनों की पहचान बन जाएगी। यह केवल एक पक्षी को बचाने का प्रयास नहीं होगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को प्रकृति से जोड़ने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम होगा।

वास्तव में कांस्टेबल शक्ति सिंह की यह मुहिम केवल घोंसले बनाने तक सीमित नहीं है। यह संवेदनशीलता, पर्यावरण प्रेम, सामाजिक जिम्मेदारी और मानवीय मूल्यों की ऐसी मिसाल है, जो यह संदेश देती है कि यदि इच्छाशक्ति मजबूत हो तो एक व्यक्ति भी समाज में सकारात्मक परिवर्तन की शुरुआत कर सकता है। उनकी यह पहल न केवल गौरैया की वापसी की उम्मीद जगा रही है, बल्कि समाज को प्रकृति के प्रति अपने कर्तव्यों का एहसास भी करा रही है।

— टीआर राहुल कुमार ‘मंदोला’ की कलम से

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