एक फौजी की 18 साल की साधना निम्बार्क वैष्णव बैरागी परम्परा के भूले-बिसरे सन्तों को फिर से जगाने की मुहिमसन्त घमण्ड देव जी की तपोभूमि, ग्राम गोली, जिला
सन्त घमण्ड देव जी की तपोभूमि, ग्राम गोली, जिला करनाल — एक शोध-यात्रा जो इतिहास बन गई
निम्बार्क सम्प्रदाय — करोड़ों का जागृत सम्प्रदाय
निम्बार्क सम्प्रदाय कोई साधारण धार्मिक परम्परा नहीं है।
यह एक जागृत सम्प्रदाय है — जिसकी स्थापना जगतगुरु निम्बार्काचार्य जी ने की। जिनका दर्शन द्वैताद्वैत आज भी भारतीय दर्शन की आधारशिला है। जिन्होंने सर्वप्रथम घोषणा की कि श्री राधा, श्रीकृष्ण के समान हैं — उनकी शक्ति हैं, उनकी आत्मा हैं। राधा-कृष्ण की युगल उपासना का यह सर्वोच्च सिद्धान्त सबसे पहले निम्बार्काचार्य जी ने संसार को दिया।
आज इस सम्प्रदाय के करोड़ों अनुयायी हैं — राजस्थान, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, बंगाल और देश-विदेश में। यह परम्परा आज भी उतनी ही जीवन्त है जितनी हज़ारों साल पहले थी।
परन्तु इस विशाल परम्परा के भीतर अनेक ऐसे महान सन्त हुए — जिन्होंने वर्षों तपस्या की, जिनकी भूमि पावन हुई — और जिनके नाम आज लगभग विस्मृत हो चुके हैं।
ऐसे ही एक सन्त थे — श्री घमण्ड देव जी।
सन्त घमण्ड देव जी — उद्धव देवाचार्य से घमण्ड देव तक
निम्बार्क सम्प्रदाय की आचार्य-परम्परा में वे मूलतः उद्धव देवाचार्य के नाम से जाने जाते थे। परन्तु सम्प्रदाय के महान आचार्य श्री हरिव्यास देवाचार्य जी ने उन्हें 'घमण्ड देव' नाम प्रदान किया।
गुरु के मुख से निकला नाम — वही जीवन भर की पहचान बन जाता है।
घमण्ड देव जी ने ग्राम गोली, जिला करनाल, हरियाणा में वर्षों तक घोर तपस्या की। उनसे सम्बद्ध लगभग तीन हज़ार बीघा भूमि इस क्षेत्र में थी — जो उनकी आध्यात्मिक एवं सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रमाण है।
आज वह भूमि बँट चुकी है। नाम मिट गया। पर गाँव के बीचों-बीच एक भव्य राधा-कृष्ण मन्दिर आज भी उस तपस्या का मूक साक्षी है।
और उस मिट्टी में आज भी वही तपस्या की ऊर्जा है।
फौजी की शोध-यात्रा — 12 मार्च 2016, ग्राम गोली
दिनांक 12 मार्च 2016 को प्रातः आठ बजे, सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी एवं इतिहासकार नरेश दास वैष्णव निम्बार्क अपने अग्रज रामफल बैरागी के साथ अपने गाँव रामनगर से 64 किलोमीटर का सफर तय कर ग्राम गोली पहुँचे।
उद्देश्य था — उस पावन भूमि का दर्शन जहाँ उनके आराध्य सन्त घमण्ड देव जी ने तपस्या की थी। क्योंकि नरेश दास जी स्वयं घमण्ड देव जी की शिष्य-परम्परा से हैं। यह शोध नहीं — यह एक शिष्य का अपने गुरु-वंश के प्रति दायित्व था।
रास्ता आसान नहीं था।
रामलला मन्दिर गए — जानकारी नहीं मिली।
खाटू श्याम मन्दिर गए — वहाँ भी निराशा।
ताश खेलते लोगों से पूछा — गर्दन उठाने की ज़हमत नहीं उठाई।
तीन-चार घंटे भटकते रहे।
बस स्टैण्ड पर चाय पी।
पर फौजी का संकल्प ऐसे नहीं टूटता।
एक और मोड़ लिया — और मिले सरपंच वीरभान बैरागी जी।
दो अनजान पथिकों को देखते ही उनके चेहरे पर जो हर्ष आया — वह अविस्मरणीय था। बिना किसी औपचारिकता के चाय, नाश्ता, भोजन — सब कुछ। सारी जानकारी। और स्वयं साथ चलकर वह भूमि दिखाई जहाँ सन्त ने तपस्या की थी।
अतिथि देवो भव — यह नारा नहीं, इस परम्परा की जीवन-शैली है।
उस भूमि पर पहुँचकर नरेश दास जी ने साष्टांग दण्डवत् प्रणाम किया। वहाँ की माटी माथे पर लगाई।
इसके बाद वे तीन बार और उस जन्मभूमि पर गए — अपनी धर्मपत्नी श्रीमती निर्मला वैष्णव के साथ। हर बार वही प्रणाम। हर बार वही माटी माथे पर। हर बार कुछ और गहरा मिला।
18 साल — एक मिशन
यह यात्रा कोई अकेली घटना नहीं थी।
नरेश दास वैष्णव निम्बार्क पिछले 18 वर्षों से निम्बार्क वैष्णव बैरागी परम्परा के भूले-बिसरे सन्तों की तपोभूमियों का — वृंदावन, मथुरा, करनाल और दर्जनों अनजान गाँवों में — प्रत्यक्ष शोध, अभिलेखन और दर्शन करते आ रहे हैं।
उनकी शोध-कृति "जगतगुरु निम्बार्काचार्य — सनातन के सूर्य" इसी 18 वर्षों की साधना का परिणाम है।
निम्बार्क सम्प्रदाय के करोड़ों अनुयायियों से निवेदन:
ये सन्त आपके पूर्वज हैं।
यह भूमि आपकी विरासत है।
इन्हें जानिए। इन्हें सम्मान दीजिए। इन्हें आगे बढ़ाइए।
लेखक परिचय:
नरेश दास वैष्णव निम्बार्क — सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी, इतिहासकार एवं निम्बार्क वैष्णव बैरागी परम्परा के शोधकर्ता।
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