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चंबल नदी के पालीघाट क्षेत्र में अंडों से बाहर निकलते घड़ियाल के नन्हे बच्चे।

*_विशेष लेख_*
*चंबल में नई जिंदगी की आहट*
*पालीघाट में 215 नन्हे घड़ियालों ने खोली आंखें, चंबल अभयारण्य में घड़ियाल संरक्षण की बड़ी सफलता*
*22 से अधिक नेस्ट में दिए गए 600 से ज्यादा अंडे, वन विभाग की चौबीस घंटे निगरानी से बढ़ा घड़ियालों का कुनबा*
*सवाई माधोपुर, 26 मई।* भीषण गर्मी और तपते रेतीले तटों के बीच राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल अभयारण्य से वन्यजीव प्रेमियों के लिए सुखद और उम्मीद जगाने वाली खबर सामने आई है। रणथम्भौर टाइगर रिजर्व की पालीघाट रेंज अंतर्गत चंबल एवं पार्वती नदी संगम क्षेत्र में दुर्लभतम घड़ियाल प्रजाति के नन्हे बच्चे अंडों से बाहर निकलकर अपनी नई दुनिया में कदम रख रहे हैं। पालीघाट क्षेत्र में अब तक करीब 100 घड़ियाल हैचलिंग्स का सुरक्षित जन्म दर्ज किया गया है, जिसे वन विभाग चंबल क्षेत्र में चल रहे संरक्षण प्रयासों की बड़ी सफलता है।
*चंबल के रेतीले तट बने नई जिंदगी की जन्मस्थली:-* वन विभाग के अनुसार इस वर्ष मार्च और अप्रैल माह के दौरान घड़ियालों ने चंबल नदी के संवेदनशील रेतीले तटों पर लगभग 22 से 25 नेस्ट तैयार किए थे। इन नेस्ट में करीब 600 से 650 अंडे दिए गए। मई के अंतिम सप्ताह से इन अंडों से बच्चों का बाहर निकलना शुरू हुआ है। अभी तक पालीघाट क्षेत्र के 6 नेस्ट से लगभग 210-215 नवजात घड़ियाल सुरक्षित बाहर आए हैं, जबकि आने वाले दिनों में अन्य नेस्ट से भी बड़ी संख्या में हैचलिंग्स निकलने की संभावना है।
*60 से 70 दिन बाद अंडों से निकलते हैं बच्चे:-* वन विभाग के अनुसार मादा घड़ियाल मार्च के प्रथम सप्ताह में नदी किनारे सुरक्षित सैंड बैंक का चयन कर घोंसला बनाती है। एक व्यस्क मादा घड़ियाल वर्ष में केवल एक बार अंडे देती है, जिनकी संख्या सामान्यतः 25 से 50 तक होती है। लगभग 60 से 70 दिनों बाद इन अंडों से बच्चे बाहर निकलते हैं और मई के अंतिम सप्ताह से जून के प्रारंभ तक नदी किनारों पर इनकी हलचल दिखाई देने लगती है।
घड़ियाल विश्व की सबसे संकटग्रस्त जलीय प्रजातियों में शामिल है तथा चंबल नदी देश में इनके सबसे सुरक्षित प्राकृतिक आवासों में से एक मानी जाती है। पालीघाट क्षेत्र में इस बार प्राकृतिक हैचिंग का सफल होना संरक्षण की दिशा में बेहद सकारात्मक संकेत है। *घड़ियाल संरक्षण के लिए चौबीस घंटे निगरानी:-* वन विभाग ने नेस्ट वाले संवेदनशील क्षेत्रों के आसपास विशेष फेंसिंग की है ताकि जंगली जानवर अंडों अथवा नवजात बच्चों को नुकसान न पहुंचा सकें। शुरुआती कुछ सप्ताह नवजात घड़ियालों के लिए सबसे संवेदनशील होते हैं। ऐसे में सुरक्षा व्यवस्था में किसी भी प्रकार की लापरवाही गंभीर नुकसान पहुंचा सकती है। विभागीय टीम द्वारा नदी तटों पर नियमित गश्त, चौबीस घंटे मॉनिटरिंग एवं संवेदनशील स्थलों का लगातार निरीक्षण किया जा रहा है। कई क्षेत्रों में मानव गतिविधियों को सीमित किया गया है तथा पर्यटकों एवं स्थानीय लोगों से नेस्टिंग क्षेत्रों से दूरी बनाए रखने की अपील की गई है।
*सिर्फ घड़ियाल नहीं, पूरी नदी पारिस्थितिकी के प्रहरी:-* विशेषज्ञों का मानना है कि घड़ियाल संरक्षण केवल एक प्रजाति को बचाने का प्रयास नहीं बल्कि पूरी नदी पारिस्थितिकी को सुरक्षित रखने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। घड़ियाल नदी के खाद्य तंत्र का अहम हिस्सा हैं और इनकी उपस्थिति स्वस्थ नदी तंत्र का संकेत मानी जाती है।
चंबल नदी का यह क्षेत्र घड़ियालों के साथ-साथ मगरमच्छ, कछुए, ऊदबिलाव, गंगा डॉल्फिन तथा कई दुर्लभ पक्षियों का भी महत्वपूर्ण आवास है। स्वच्छ जलधारा और विस्तृत रेतीले तट यहां घड़ियालों के प्रजनन के लिए आदर्श वातावरण उपलब्ध कराते हैं।
*चंबल बना संरक्षण का मजबूत मॉडल:-* स्थानीय ग्रामीणों एवं वन्यजीव प्रेमियों ने वन विभाग के प्रयासों की सराहना करते हुए इसे पूरे चंबल क्षेत्र के लिए सकारात्मक संकेत बताया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वैज्ञानिक संरक्षण, स्थानीय सहयोग और सतत निगरानी इसी प्रकार जारी रही तो आने वाले वर्षों में चंबल क्षेत्र देश में घड़ियाल संरक्षण का सबसे सफल मॉडल बन सकता है।
*घड़ियाल संरक्षण को मिलेगा नया बल, पालीघाट में विकसित हो रहा अत्याधुनिक रेयरिंग सेंटर:-* राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल अभयारण्य में संकटग्रस्त घड़ियाल प्रजाति के संरक्षण को और अधिक प्रभावी बनाने के लिए रणथम्भौर टाइगर रिजर्व की पालीघाट रेंज में अत्याधुनिक “घड़ियाल रेयरिंग सेंटर” विकसित किया जा रहा है। राजस्थान वानिकी एवं जैव विविधता विकास परियोजना (आर.एफ.बी.डी.पी.) के वित्त पोषण से वर्ष 2025-26 में 27.25 लाख रुपए की लागत से यह परियोजना संचालित की जा रही है। रेयरिंग सेंटर का उद्देश्य प्राकृतिक रूप से निकलने वाले घड़ियाल हैचलिंग्स को शुरुआती संवेदनशील अवस्था में सुरक्षित संरक्षण प्रदान कर उन्हें परिपक्व होने तक संरक्षित रखना है, ताकि उनकी जीवित रहने की संभावना बढ़ाई जा सके।
परियोजना के तहत विशेष डिजाइन वाले एनक्लोजर, बास्किंग प्लेटफॉर्म, फूड ग्रेड वॉटर टैंक आधारित होल्डिंग पेन, जल फिल्ट्रेशन एवं पम्पिंग सिस्टम, सीसीटीवी सर्विलांस सिस्टम तथा नदी गश्त के लिए एल्युमिनियम स्पीड मोटर बोट जैसी आधुनिक सुविधाएं विकसित की जा रही हैं। इन व्यवस्थाओं से नवजात घड़ियालों की सुरक्षा एवं वैज्ञानिक निगरानी और अधिक प्रभावी होगी।
पालीघाट रेयरिंग सेंटर में गत वर्ष 30 से अधिक घड़ियाल हैचलिंग्स को संरक्षित किया गया था। लगभग चार माह तक देखरेख के बाद उन्हें परिपक्व होने पर पर्यटन मंत्री संजय शर्मा द्वारा पुनः चंबल नदी में छोड़ा गया था। इस वर्ष चंबल एवं पार्वती नदी संगम क्षेत्र में बड़ी संख्या में नेस्ट मिलने के बाद अधिकतम हैचलिंग्स को रेयरिंग सेंटर में सुरक्षित रखने की तैयारी की गई है। वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार यह सेंटर भविष्य में देश में घड़ियाल संरक्षण का एक प्रभावी मॉडल बन सकता है।
*चुनौतियां अब भी बरकरार, आमजन से घड़ियाल संरक्षण के लिए प्राकृतिक वातावरण को प्रभावित न करने की अपील:-* हालांकि विशेषज्ञों ने नदी प्रदूषण, घटते जल प्रवाह एवं बढ़ते मानवीय दबाव को अब भी घड़ियालों के अस्तित्व के लिए गंभीर खतरा बताया है। वन विभाग ने आमजन से अपील की है कि नदी किनारों पर प्लास्टिक एवं कचरा नहीं फेंकें तथा वन्यजीवों के प्राकृतिक वातावरण को प्रभावित करने वाली गतिविधियों से बचें।
फोटो कैप्शन:- 26 पीआरओ 1 से 5

(सुरेन्द्र कुमार मीणा)
सहायक जनसम्पर्क अधिकारी
सवाई माधोपुर
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